जयंती विशेष: के बी सहाय -एक अपराजेय योद्धा

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बिहार के राज्य प्रशासन में लोग उन्हें “लौह पुरूष” मानते थे। उनकी बोली जितनी कडक थी। ह्दय से उतनी ही उदारता, गरीबों के लिए स्नेह यानि सूबे के चौथे मुख्यमंत्री विकास पुरूष कृष्ण बल्लभ सहाय। जिनका जन्म 31 दिसंबर 1889  को बिहार के पटना जिले के शेखपुरा में हुआ था ….”

पटना (एक्सपर्ट मीडिया न्यूज ब्यूरो)।  बिहार के महान विभूतियों में शामिल  के बी सहाय उर्फ कृष्ण बल्लभ सहाय एक महान स्वतंत्रता सेनानी, समाजसेवी, योग्य प्रशासक, भूमि सुधार के जनक और बिहार के प्रथम विकास पुरूष मुख्यमंत्री थे। जिन्हें “बिहार का लौह पुरूष” भी कहा जाता है। जिन्होंने अपनी जिंदगी में कभी समझौता नही किया, कभी हार नही मानी।

उनके पिता मुंशी गंगा प्रसाद ब्रिटिश राज के समय दारोगा थे। बड़े ही रोबदार किस्म के दारोगा थे। के बी सहाय चाहते थे कि उनके पिता दारोगा की नौकरी छोड़ कर आजादी में शामिल लोगों की मदद करे।

इस बात को लेकर हमेशा पिता-पुत्र में अनबन बनी रहती थी। अंततः के बी सहाय ने अपने पिता का घर छोड़ देश की आजादी में कूद गए। के बी सहाय की प्रारंभिक शिक्षा गाँव में फिर कलकत्ता में हुई। जहाँ से उन्होंने अंग्रेजी विषय में प्रथम श्रेणी से स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की।

कलकत्ता क्रांतिकारियों का गढ़ माना जाता था। पढ़ाई के दौरान ही वे क्रांतिकारी गुटों में शामिल होकर देश की आजादी की लड़ाई में कूद पड़े। 1920 में स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया। 1930 से 1934 के बीच विभिन्न समय के लिए वह चार बार जेल भी गए।

कहा जाता है कि बिहार में जिन थोड़े से नेताओं को महात्मा गांधी का सान्निध्य मिला था। उनमें के बी सहाय का भी नाम है। के बी सिर्फ महात्मा गांधी के सम्पर्क में ही नहीं आए बल्कि नेहरू, अब्दुल गफ्फार खान सहित कई चोटी के नेताओं के सम्पर्क में रहने का मौका  उन्हें मिला।

ब्रिटिश राज के तहत जब प्रादेशिक स्वायत्तता प्रदान की गई थी, तब वह 1936 में बिहार विधानसभा चुनाव में हजारीबाग ग्रामीण विधानसभा के लिए चुने गए। 1937 में श्रीकृष्ण सिंह के मंत्रालय में उन्हें संसदीय सचिव बनाया गया।

इस दौरान जमींदारों के हाथों गरीबों के हो रहे शोषण ने सहाय के दिल में गरीबों के प्रति सहानुभूति जगा दी। स्वतंत्रता के बाद जब बिहार में अंतरिम सरकार का गठन किया गया। केबी सहाय को राजस्व मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी गई क्योंकि उन्हें यह विषय बहुत पसंद था।

के बी सहाय ने अपना पहला चुनाव 1952 में गिरिडीह के डूमरी से लड़े और बड़े अंतर से चुनाव जीते भी। उन्हें श्री कृष्ण सिंह मंत्रिमंडल में जगह मिली। वे राजस्व मंत्री बनाए गए।

1957 में हुए विधानसभा चुनाव में उन्हें राजा कामाख्या नारायण सिंह के हाथों हार का सामना करना पड़ा। लेकिन, पांच साल बाद 1962 में हुए चुनावों में वह फिर से तीसरी बार बिहार विधानसभा के लिए पटना पश्चिम से चुने गए। जहाँ से चौथी बार भी चुनाव जीतने में सफल हुए ।

2 अक्टूबर 1963 को महात्मा गांधी के जन्मदिन के अवसर पर के बी सहाय ने बिहार के चौथे मुख्यमंत्री पद के रूप में शपथ ली। सहाय को मुख्यमंत्री बनाने में सत्येंद नारायण सिन्हा का अहम योगदान रहा था, जो पिछले सरकार में शिक्षा मंत्री थे।

केबी ने उन्हें अपने मंत्रालय में उपमुख्यमंत्री के तौर पर शामिल किया। 1967 के विधानसभा चुनाव में वे अपने मित्र महामाया प्रसाद सिन्हा से उन्हें हार का सामना करना पड़ा।

उनकी पराजय से कांग्रेस को भारी झटका लगा। प्रदेश में पहली बार गैर कांग्रेस सरकार की नींव रखी गई। लेकिन 1974 में बिहार विधानसभा के ऊपरी सदन के लिए चुने गए। अय्यर आयोग ने भ्रष्टाचार के आरोप के चलते उनके खिलाफ जांच की, लेकिन वह इस जांच में बरी हो गए।

के बी सहाय देश के पहले राजस्वमंत्री थे। जिन्होने जमींदारी उन्मूलन के लिए आवाज उठायी,बिगुल फूंका। उस समय के मुख्यमंत्री श्री कृष्ण सिंह इस बबाल से दूर रहना चाहते थे। जमींदार के बी के खिलाफ खड़े हो गए। आंदोलन शुरू कर दिया। अदालत तक घसीट कर ले गए। लेकिन वे हार नही माने। जमींदारी उन्मूलन के लिए खडे रहे।

1955-56 में जमींदारी प्रथा को उखाड कर ही दम लिया। बटाईदारी तथा जमींदारी उन्मूलन, भू हदबंदी का निर्धारण, गरीबों के बीच जमीन वितरण, भूमिहीनों को वासगीत का पर्चा देने, गरीब किसानों की सहायता जैसे कई भूमि सुधार के अनेकों काम किए जिसके लिए लोग आज भी उनका लोहा मानते हैं।

अपने छोटे से कार्यकाल में बिहार में बड़े उद्योग लगाने का श्रेय भी केबी सहाय को जाता है। बरौनी रिफाइनरी, बोकारो स्टील प्लांट जैसे उद्योग उन्हीं के मुख्यमंत्रित्व काल में स्थापित किए गए थे।

सीएम रहते हुए उन्होंने तिलैया में सैनिक स्कूल स्थापित करने में भी अहम योगदान दिया। हजारीबाग में महिला कॉलेज भी उन्हीं की देन है। पटना का सदाकत आश्रम और रांची कांग्रेस भवन का निर्माण उनके ही कार्यकाल में हुआ था।

बिहार की राजनीति में के बी सहाय के दाहिना हाथ थे रामलखन सिंह यादव। बाएँ हाथ के रूप में राधके अमानत अली और ह्दय थे एस के बागे। देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद भी उनके पारिवारिक मित्रों में थे।

एक बार की बात है। तब श्री सहाय गांधी जी के आश्रम में थे। आश्रम के कुछ लोगों ने गांधी जी से शिकायत की थी कि अंडा खाने वाले इस बिहारी को आप आश्रम से निकाल दीजिए।

कहते हैं गांधी जी ने मुस्कुरा कर अब्दुल गफ्फार खानं के बारे में इशारा करते हुए कहा कि उनसे जाकर पूछो जो अंडा और उसके माता पिता दोनों को खा जाता है। शिकायतों के बावजूद गांधी जी ने इस संबंध में के बी सहाय से कभी कुछ नहीं पूछा, वैसे आश्रम में रहते हुए उन्होंने कभी अंडा नहीं खाया था ।

3 जून 1974 को एक सड़क हादसे में उनकी मौत हो गई। के बी सहाय आज नहीं हैं। मगर मुख्यमंत्री और मंत्री के रूप उनके प्रशासन को पुराने लोग आज भी याद करते हैं। देश और देश के बाहर बिहार की शासन व्यवस्था का नाम उन्होंने रौशन किया था। लोगों का मानना है कि उनके जैसा ‘लौह पुरूष’ बिहार की धरती पर पैदा नही हो सकता।

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