जब जेपी ने इंदिरा को लिखा- ‘RSS मुझे नाथूराम गोडसे की तरह गद्दार समझता है’

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भारतीय स्वतंत्रता सेनानी और जननेता, लोकनायक जयप्रकाश नारायण (जेपी) की 117वीं जयंती है। उन्होंने इंदिरा गांधी की नीतियों के विरोध में ऐसा आंदोलन खड़ा किया, जिससे देश की राजनीति ही बदल गई थी………”

 इंडिया न्यूज रिपोर्टर डेस्क। लोकनायक जयप्रकाश नारायण का जन्म 11 अक्टूबर, 1902 को बिहार के सारण जिले के सिताबदियारा गांव में हुआ था। जेपी ने इंदिरा गांधी को कश्मीर मुद्दे पर खत लिखते हुए कहा था कि आरएसएस मुझे गद्दार समझता था।

जेपी के इस आंदोलन में आरएसएस के लोग भी बकायदा शामिल थे, लेकिन एक वक्त ऐसा भी था जब जेपी ने इंदिरा गांधी को खत लिखकर कहा कि आरएसएस मुझे उसी तरह का गद्दार समझता है जिस तरह से नाथूराम गोडसे महात्मा गांधी को गद्दार समझता था।

लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने इंदिरा गांधी को कश्मीर मुद्दे पर पत्र लिखा था। इस पत्र में उन्होंने इंदिरा गांधी से शेख अब्दुलाह की रिहाई के संबंध में कश्मीर समस्या का जिक्र करते हुए कहा था, ‘मैं ये भी नहीं सोचता हूं कि वे (कश्मीरी) देश के गद्दार हैं। नाथूराम गोडसे ने सोचा था कि गांधी जी गद्दार थे। आरएसएस समझता है कि जयप्रकाश गद्दार हैं। गोडसे एक व्यक्ति था, जबकि आरएसएस एक निजी संगठन है।’

उन्होंने आगे जिक्र करते हुए कहा कि एक लोकतांत्रिक सरकार लोगों का प्रतिनिधित्व करती है और इसके कुछ सिद्धांत होते हैं, जिसके अनुरूप वह कार्य करती है। भारत सरकार किसी को गद्दार नहीं करार दे सकती, जब तक पूरी कानूनी प्रक्रिया से ये साबित न हो जाए कि वह गद्दार है।

अगर सरकार ऐसा करने में अपने को असमर्थ पाती है, तब डीआईआर का प्रयोग करना और लगातार प्रयोग करना कायरतापूर्ण है, उस समय भी जब देश की सुरक्षा को कोई खतरा महसूस न हो।

जय प्रकाश नारायण लिखते हैं कि कश्मीर ने दुनिया भर में भारत की छवि को जितना धूमिल किया है, उतना किसी और मसले ने नहीं किया है। रूस समेत दुनिया का कोई ऐसा देश नहीं है, जो हमारी कश्मीर संबंधी नीतियों की तारीफ करता हो, यद्यपि उनमें से कुछ देश अपने कुछ वाजिब कारणों से हमें समर्थन देते हैं।

जेपी आगे खत में लिखते हैं, ‘मैं शेख अब्दुलाह की रिहाई की मांग इसलिए नहीं कर रहा हूं क्योंकि वे मेरे दोस्त हैं या मैं नागरिक स्वतंत्रता से सरोकार रखता हूं। इस संदर्भ में मेरी प्राथमिक रुचि कश्मीर समस्या के समाधान खोजने की दिशा में है। जैसा कि मैं देख पाता हूं कि अगर इस समस्या का कोई समाधान संभव है, तो वह शेख अब्दुल्ला के सहयोग से ही संभव है।’

उन्होंने आगे लिखा, ‘हालांकि मैं इस बारे में पूर्ण रूप से आश्‍वस्त नहीं हूं, लेकिन कोई भी ऐसा नहीं कह सकता है। जो विचार मेरे सामने हैं, वे स्पष्ट रूप से शेख अब्दुल्ला की बिना शर्त रिहाई के पक्ष में हैं। उसमें जोखिम हो सकता है, लेकिन यह जोखिम तो हर बड़े राजनीतिक और सैनिक निर्णय में लेना होता है। वास्तव में, यह जोखिम मानव के अधिकतर निर्णयों में रहता है, यहां तक कि जब दो लोग शादी करने का निर्णय लेते हैं, तब भी रहता है।’

उन्होंने आगे लिखा, ‘वे उनके बयानों को तोड़-मरोड़कर अपनी बात साबित करने की कोशिश करते हैं। उदाहरण के लिए, ऐसा मान लिया जाता है कि मैं नगाओं के लिए नगालैंड और पाकिस्तानियों को कश्मीर सौंपने की वकालत करता हूं। लेकिन ऐसा मैंने कभी नहीं कहा। यहां तक कि अक्साई चीन के मामले में, मैंने एक लीज (एक अंतरराष्ट्रीय मान्यताप्राप्त लेन-देन, जिस पर हाल में भारत-नेपाल समझौते में भारत ने सहमति दी है) का सुझाव दिया था। लेकिन मेरी एक गलत छवि बनाकर पेश की गई, जिससे दूसरों के लिए आलोचना करना आसान हो गया।’

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