जब गुलजार ने नालंदा की ‘सांसद सुंदरी’ तारकेश्वरी पर बनाई फिल्म ‘आंधी’

Share Button

“तारकेश्वरी सिन्हा ‘ग्लैमर्स गर्ल्ल’, ‘पार्लियामेंट ब्यूटी’ न जाने कितने नामों से जानी जाती थी। 1975 में मशहूर गीतकार गुलजार ने कमलेश्वर की कहानी पर एक फिल्म बनाई थीं। जिसका नाम उन्होंने “आंधी”रखा था….”

INR (जयप्रकाश नवीन)। ज्ञान की धरती नालंदा, भगवान बुद्ध और महावीर की धरती नालंदा जहाँ से देश के कई राजनीतिक के सशक्त हस्ताक्षर पैदा हुए हैं। उन्हीं में से एक देश की प्रथम महिला केंद्रीय वित्त उपमंत्री रही तारकेश्वरी सिन्हा शामिल हैं। जिनकी सियासी सफर किसी फिल्म से कम नहीं है।

जिनमें पति-पत्नी और ‘वो’ की कहानी थी। विवादों की सियासत थी। राजनीति का वो ग्लैमर भी था। एक दौर था जब उनके चाहनेवाले, उनके जलवों के कई मशहूर राजनीतिक हस्तियाँ दीवानी थी।

उनका व्यक्तित्व लोगों के दिलों दिमाग पर राज करती थी। बला कि खूबसूरत, बॉब कट बाल,जहाँ खड़ी हो जाती, वहाँ का माहौल बदल जाता। सांसदों और मंत्रियों के बीच उनकी ही दीवानगी देखी जाती थी।

कहा जाता है कि बहुत सारे सांसद और मंत्री संसद सत्र के दौरान अपने क्षेत्र से इसलिए संसद दौड़े चले आते थे, ताकि तारकेश्वरी सिन्हा का दर्शन कर सकें। ‘ग्लैमर्स गर्ल्ल’, ‘पार्लियामेंट ब्यूटी’ न जाने कितने नामों से जानी जाती थी। 1975 में मशहूर गीतकार गुलजार ने कमलेश्वर की कहानी पर एक फिल्म बनाई थीं। जिसका नाम उन्होंने “आंधी”रखा था।

इस फिल्म में एक होटल मैनेजर को एक राजनेता की बेटी से प्यार हो जाता है। बाद में दोनों शादी कर लेते हैं। बाद में दोनों की जिंदगी में तकरार और मतभेद आ जाता है। वे अलग हो जाते हैं। अर्से बाद फिर से दोनों की मुलाकात होती है। मिलने पर दोनों रिश्ते को फिर से मौका देने का फैसला करते हैं । इस फिल्म में संजीव कपूर और सुचित्रा सेन की मुख्य भूमिका थी।

जिसके बारे में चर्चा रही कि उक्त फिल्म इंदिरा गाँधी और उनके पति फिरोज गांधी के पारिवारिक जीवन पर बनी थी। लेकिन फिल्म के निर्देशक गुलजार ने कभी लिखा था कि यह फिल्म तत्कालीन केंद्रीय मंत्री तारकेश्वरी के जीवन पर आधारित थी।

गुलजार का कहना है कि 1969-71 के बीच तारकेश्वरी सिन्हा उनके शहर लुधियाना आई थी। उनके साथ वित्त मंत्री मोरारजी देसाई और लिंगिपा भी थे। इन दो सालों में गुलजार उनके व्यक्तित्व से काफी प्रभावित हुए।

बाद में प्रसिद्ध लेखक कमलेश्वर ने उनके जीवन पर कहानी लिखी, जिसे गुलजार ने निर्देशित किया था। 1975 में आपातकाल के दौरान  बनी फिल्म “आंधी” को रिलीज का आदेश नहीं मिला, लेकिन जब 1977 में मोरारजी देसाई की सरकार आई तो यह फिल्म 1978 में रिलीज हुई और इसकी खूब चर्चा भी सियासी गलियारे में रही।

26 दिसंबर 1926 को जन्मी तारकेश्वरी की राजनीति में शुरुआत मगध महिला कॉलेज के छात्र संघ चुनाव को जीत कर हुई थी। वह भारत की पहली ऐसी महिला राजनेता थीं, जिसके भारत छोड़ों आंदोलन में बड़ी ही सक्रियतापूर्वक भाग लिया था।

वह उस समय इंटर में पढ़ती थी और पटना के हॉस्टल में रहती थी। 1942 में पटना में सचिवालय पर झंडा फहराना था। विधार्थियों के साथ वें भी सचिवालय चली गईं। वहाँ गोली लगने से जब एक नौंवी के छात्र की मौत हो गई तो वहाँ भगदड मच गया। वहाँ से भागकर तारकेश्वरी एक मंदिर में छिप गई। फिर एक शिक्षक के घर पर आसरा ली।

कहा जाता है कि जब भारत विभाजन के दौरान  बिहार के नालंदा के नगरनौसा में उन दिनों वहां हिन्दू–मुस्लिम दंगा हो गया था। उस दंगे को रोकने के लिए महात्मा गांधी और पंडित जवाहरलाल नेहरू दोनों नगरनौसा आएं थे। चारों तरफ तनातनी का माहौल था और इन सब के बावजूद तारकेश्वरी बापू को लेने नालंदा जिले के नगरनौसा  पहुंच गई थी।

इसी बीच उनकी शादी छपरा हो गई।शादी के बाद भी वें आगे की पढ़ाई के लिए ऑक्सफोर्ड चली गई, जहाँ से उन्होंने अर्थशास्त्र में उच्च शिक्षा प्राप्त की। लेकिन अपने सर्जन पिता की निधन के बाद उन्हें लंदन से वापस आना पढ़ा।

वापस आने के बाद तारकेश्वरी को अपने ससुराल जाना पड़ गया। वहाँ से वे कलकत्ता चली गईं, जहाँ अपने पति के साथ गृहस्थी बसाने की तैयारी कर रही थी। एक दिन उनके मां का पत्र मिला, जिसमें लिखा था कि चाहो तो चुनाव में खड़ी हो जाओ। उनके मामा की राजनीति में काफी दखल थी। तारकेश्वरी को मां की सलाह पसंद आ गई। मामा ने ही पटना से टिकट का जुगाड किया।

1952 में प्रथम आम चुनाव में पटना से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ी और जीतकर 26 साल की उम्र में संसद पहुँच गई। फिर उन्होंने पीछे मुड़कर नही देखा। इसके बाद 1957, 1962 और 1967 में बाढ़ लोकसभा क्षेत्र  से ही जीत कर वह लगातार लोकसभा सांसद बनी रही।

उन दिनों नेहरू से लेकर लोहिया तक उनकी वाक्पटुता और सुंदरता के कायल थे। तारकेश्वरी के बारे में कहा जाता है कि वह देखने में जितनी खूबसूरत थीं उतनी ही बेहतरीन वह एक वक्ता के रूप में थीं। लोग अक्सर उन्हें ‘ब्यूटी विथ ब्रेन’ कहते थे।

संसद में जब भी वो भाषण देने या बहस करने उठती तो लोगों की आंख और कान दोनों तारकेश्वरी के हो जाते। यहां तक कि विपक्ष भी उनके शब्दों से घायल हो कर उनकी वाकपटुता का कायल हो जाता।

कहते हैं कि उनकी हिंदी जितनी अच्छी थी, उससे कई ज्यादा अच्छी उनकी अंग्रेजी थी और दोनों भाषाओं से भी उम्दा, उनकी उर्दू पर पकड़। कई बार तो वह संसद में बहस के दौरान तंज और तानों को भी उर्दू के मखमली अंदाज में लपेटकर विपक्ष को दे मारती थीं और सब के हांथ वाह–वाह कर टेबल थपथपाते रह जाते थे।

राजनीति हो या भाषा हो या अर्थशास्त्र, सब पर उनकी गजब पकड़ थी। शायद इसी को देखते हुए 1958 में नेहरू ने उन्हें वित्त मंत्रालय का कार्यभार सौंप कर भारत की पहली महिला उप वित्त मंत्री बनने का मौका दिया था।

दरअसल तारकेश्वरी इंदिरा के पिता पंडित नेहरू और पति फ़िरोज गांधी दोनों के ही बहुत करीब थी। इसके अलावा तारकेश्वरी सिन्हा बाद के सालों में वित मंत्री मोरारजी देसाई के काफी करीब आ गई थी।

तभी तो कहा जाता है कि पंडित जवाहरलाल नेहरू के बाद तारकेश्वरी सिन्हा प्रधानमंत्री नाम को लेकर लालबहादुर शास्त्री की जगह मोरारजी देसाई को पीएम बनाने की मुहिम छेड़ रखी थी।

1969 में जब कांग्रेस का विभाजन हुआ तारकेश्वरी सिन्हा ने  इंदिरा गाँधी  की जगह मोररारजी देसाई का खेमा चुना। यही उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक भूल मानी जाती है। माना जाता है कि उसी दिन से भारतीय राजनीति में उनकी सियासी पारी का अंत हो गया।

1971 में तारकेश्वरी सिन्हा बाढ़ लोकसभा क्षेत्र से (कांग्रेस संगठन ) चुनाव मैदान में थी उनके सामने धर्मवीर सिंह थे। कहा जाता है कि तब रामलखन सिंह यादव कांग्रेस के दिग्गज नेता हुए करते थे। पीएम इंदिरा गाँधी ने रामलखन सिंह यादव के सामने अपना आंचल फैला दिया था। रामलखन सिंह यादव ने इंदिरा गांधी की उस आंचल की लाज बचा ली थी।

बाढ़ लोकसभा से धर्मवीर सिंह की जीत से इतनी खुश हुई कि उन्होंने धर्मवीर सिंह को कैबिनेट में जगह देकर सूचना एवं प्रसारण मंत्री बना दिया । 1975 में आपातकाल के बाद तारकेश्वरी फिर से कांग्रेस में लौट गई। 1978 में जब बिहार के सीएम कपूर्री ठाकुर ने समस्तीपुर सीट छोड़ी तो तारकेश्वरी सिन्हा वहाँ से चुनाव लड़ी लेकिन हार गई।

मोरारजी देसाई के काफी करीब रही तारकेश्वरी को 1977 में मोरारजी देसाई का भी साथ नहीं मिला ।1978 के बाद से धीरे धीरे वह राजनीतिक नेपथ्य में चली गईं। अपने 19 साल के राजनीतिक जीवन में तारकेश्वरी कभी इतनी नहीं टूटी थी, जितनी वह कुछ सालों में टूट गई थी।

राजनीतिक पंडित मानते थें  कि  नेहरू के बाद एक तारकेश्वरी का ही कद कांग्रेस पार्टी में इंदिरा से बड़ा था। भले ही मोरारजी देसाई भी कांग्रेस के आला नेताओं में थे पर इंदिरा और तारकेश्वरी में उन्होंने भी सदा तारकेश्वरी को ही चुना।

बाद के सालों में तारकेश्वरी सिन्हा गुम सी हो गई। 14 अगस्त 2007 को उनका जब निधन हुआ तो कोई जान भी नहीं सका कि कभी संसद की’ब्यूटी एमपी’ अब नहीं रही।

तारकेश्वरी सिन्हा कहा करती थी कि हमलोग जनता के सही मायने में सेवक हुआ करते थें।हमने पैसा कमाने के लिए कभी सोचा ही नहीं। लोगों की नजरों से गिरकर नहीं सम्मान पाकर ही जीना सबसे बड़ा मकसद था। लोक सेवा सही मायनों में जनसेवा ही हुआ करती थी।

देश की प्रथम महिला केंद्रीय वित्त मंत्री तारकेश्वरी सिन्हा कभी ग्लैमरस राजनीतिक रही लेकिन जीवन के आखिरी 29 साल वह गुमनामी में खो गई। शायद जीवन एक ठग ही तो है। गुजरता हुआ साथ, गुजरती हुई शक्लें, बिसुरती हुई यादें, वो हसीन मुलाकातें, वो राते, वो बातें सभी उनके साथ अस्ताचल की ओर जाते हुए सूर्य की तरह हमेशा के लिए अतीत हो गई।

0 0
Happy
Happy
0 %
Sad
Sad
0 %
Excited
Excited
0 %
Sleppy
Sleppy
0 %
Angry
Angry
0 %
Surprise
Surprise
0 %
Share Button

Related News:

कल सुबह 10.30 बजे आएगा अयोध्या पर फैसला, समूचे देश में हाई अलर्ट
भारत दर्शन का केंद्र है राजगीर मलमास मेला
एसिड अटैक केस में ऐसे एनकाउंटर कर चुके हैं पुलिस कमिश्नर सीपी सज्जनार
समूचे देश में सजा है बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ के नाम पर ठगी का बाजार
Google Doodle Celebrates Poet And Women's Rights Activist Kamini Roy
ऑस्ट्रेलिया के सभी अख़बारों का पहला पन्ना क्यों है काला!
रोहित के बल्ले से उड़े दिग्गजों के रिकार्ड, ब्रेडमैन भी हुए पीछे
'भाजपा भगाओ-देश बचाओ' से साबित, लालू आज भी सबसे बड़े कद्दावर नेता
पत्रकार वीरेन्द्र मंडल को सरायकेला SP ने यूं एक यक्ष प्रश्न बना डाला
जानिये मीडिया के सामने हुए अलीगढ़ पुलिस एनकाउंटर का भयानक सच
यूपी उप चुनावः भाजपा को हर सीट पर मिल रही कड़ी चुनौती
बर्निंग बस के दर्दनाक हादसे पर हरनौत के विधायक हरिनारायण सिंह की संवेदनहीनता तो देखिये....
रिटायर्ड सिपाही का बेटा लेफ्टिनेंट बन नगरनौसा का नाम किया रौशन
बड़ा रेल हादसाः रावण मेला में घुसी ट्रेन, 100 से उपर की मौत
5 साल की सजा के 48 घंटे बाद ही जमानत पर यूं रिहा हुआ सलमान
ये हैं चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा और उन पर सवाल उठाने वाले 4 जज
मॉम के रुप में श्रीदेवी का दिख रहा भावुक अंदाज
एससी-एसटी एक्ट मामले में सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला अभी सुरक्षित
साध्वी यौन शोषण केस में स्वंभू संत राम रहीम दोषी, भड़की हिंसा, अब तक 10 की मौत, सैकड़ों घायल
दलित राजनीति की सशक्त धारा को भुनाने की सफल प्रयास है ‘काला’
जेपी स्मृति दिवस विशेष: जब जेपी की मौत पर फूट-फूट कर रोए लालू
सुप्रीम कोर्ट के आगे पिटे मोदी-शाह, डीसीएम के बाद सीएम का भी इस्तीफा, बीजेपी की मिट्टीपलीद
'संपूर्ण क्रांति' के 44 सालः ख्वाहिशें अधूरी, फिर पैदा होंगे जेपी?
नालोशिप्रा का राजगीर सीओ को अंतिम आदेश, मलमास मेला सैरात भूमि को 3 सप्ताह में कराएं अतिक्रमण मुक्त

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Loading...
Close
error: Content is protected ! india news reporter