» पुलिस सुरक्षा बीच भरी सभा में युवक ने केंद्रीय मंत्री को यूं जड़ दिया थप्पड़   » SC का बड़ा फैसलाः फोन ट्रैकिंग-टैपिंग-सर्विलांस की जानकारी लेना है मौलिक अधिकार   » जयरामपेशों का अड्डा बना आयडा पार्क   » चारा घोटा की नींव रखने वाले को पर्याप्त सबूत होते भी सीबीआई ने क्यों बख्शा!   » बलिया-सियालदह ट्रेन से भारी मात्रा में नर कंकाल समेत अंतर्राष्ट्रीय तस्कर धराया   » लेकिन, प्राईवेट स्कूलों की जारी रहेगी मनमानी, बोझ ढोते रहेंगे मासूम   » ईको टूरिज्म स्पॉट बनकर उभरेगा घोड़ा कटोरा :सीएम नीतीश   » कानून बनाओ या अध्यादेश लाओ, राममंदिर जल्द बनाओ : उद्धव ठाकरे   » 26 को प्रभातफेरी निकाल बच्चें चमकाएंगे यूं सरकार का चेहरा   » …और खून से लथपथ इंदिरा जी का सिर अपनी गोद में रख सोनिया चल पड़ी अस्पताल  

चार साल में मोदी चले सिर्फ ढाई कोस

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भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले राजग गठबंधन की सरकार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में 26 मई को  चार साल का सफर तय कर लिया है। यह अच्छा मौका है इनकी सरकार के कामकाज की निष्पक्ष ढंग से समीक्षा करने का। नरेंद्र मोदी नाम के शख्स ने 2014 के आम चुनाव में भाजपा का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित होते ही एक शानदार प्रचार अभियान चलाया था।”

-: नवीन शर्मा :-

अबकी बार मोदी सरकार का नारा अभियान का केंद्रीय तत्व हो गया और बाकि महत्वपूर्ण मुद्दे गौण हो गए यानि चुनाव व्यक्ति केंद्रित हो गया। भाजपा की जीत अदभुत  कही जाएगी। इतनी शानदार जीत के साथ पहली बार कोई गैर-कांग्रेसी सरकार केंद्र में आई थी। मोदी को जितनी शानदार जीत लोगों ने दिलाई थी उनकी उम्मीदें भी उसी हिसाब से परवान चढ़ी।

आम लोगों को लगा कि हमारे बीच का चाय बेचनेवाला प्रधानमंत्री बना है। इस व्यक्ति को  आम लोगों के दुख दर्द का शिद्दत से अहसास है इसलिए यह जरूर हमारे दुख-दर्द दूर करेगा। इसलिए इन लोगों ने अच्छे दिन जल्द आएंगे ऐसी उम्मीदें पाल लीं लेकिन आज चार साल बाद निम्न और मध्यवर्ग को अच्छे दिनों की  आहट भी नजर नहीं आ रही है।

‘सबका साथ, सबका विकास’

भाजपा ने अपने घोषणापत्र में वादा किया था कि वह ‘सबका साथ, सबका विकास’ नीति पर चलेगी लेकिन यह वादा पूरा होता नजर नहीं आता है। अभी तक के सरकार के काम काज पर नजर डाले तो केंद्र सरकार उद्योगपतियों और संपन्न वर्ग की ही तरफदार नजर आती है। आम आदमी उसके एजेंडे में नजर ही नहीं आता है।

नरेंद्र मोदी ने भी पार्टी के चुनाव घोषणापत्र जारी होने के मौके पर कहा था कि  एक सरकार को गरीबों के लिए काम करना चाहिए और उन्हें अच्छी शिक्षा और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं देना चाहिए। लेकिन लगता है कि यह बातें कहना तो आसान है पर करना काफी मुश्किल।

हालांकि स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च बढ़ा कर जीडीपी का 1.4 फीसदी किया गया है। इसे बढ़ाकर कम से कम 3 फीसदी तो करना ही चाहिए, क्योंकि हमारे यहां बीपीएल परिवारों की संख्या बहुत है। शिक्षा पर खर्च बढ़ाया गया है लेकिन इसे जीडीपी का 6फीसदी करना चाहिए क्योंकि यही वो सबसे महत्वपूर्ण सेक्टर है जो देश के चहुंमुखी विकास का इंजन है।

 

इसे दुरूस्त रखेंगे तो सभी क्षेत्रों में लाभ मिलेगा। सरकार शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में निजी क्षेत्र पर बहुत ज्यादा आश्रित हो रही है जो हमारे जैसे विकासशील देश के लिए उचित नहीं है। इसलिए अच्छी शिक्षा और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं आम आदमी के लिए अब भी दूर की कौड़ी हैं

नहीं घटी महंगाई

मोदी ने अपनी चुनावी रैलियों में महंगाई पर काफी भाषण दिेए थे। महंगाई कम करने का एक टाइमफ्रेम भी दिया था पर अफसोस यह कि इस मामले में यह सरकार पिछली यूपीए सरकार से भी गई बीती रही है। यूपीए सरकार के अंतिम दिनों में जब कच्चे तेल का दाम 120 प्रति बैरल यूएस डाल था तो पेट्रोल 71 रुपये के आसपास था।

मोदी के भाग्य से उनके शपथ ग्रहण के कुछ दिन बाद से ही कच्चे तेल  के दाम तेजी से गिरने लगे। 20 जनवरी 2016 को तो कच्चा तेल रिकार्ड तोड़ कर 27 यूएस  डॉलर तक पहुंच गया। लेकिन जिस हिसाब से कच्चे तेल के दाम कम हुए उस हिसाब से पेट्रोल और डीजल के दाम कम नहीं किए गए। पेट्रोंल के दाम तो 60रुपये से  नीचे कभी भी नहीं आए जबकि अंतराष्ट्रीय बाजार में कम मूल्य का लाभ आम लोगों तक पहुंचाया जाता तो वह 30 रुपये तक पहुंच जाता।

लेकिन पेट्रोलियम कंपनियों ने इस मौके को अपनी खुद की मुनाफाखोरी के गोल्डन चान्स के रूप में  इस्तेमाल किया और आम आदमी को महंगाई की मार झेलने के लिए छोड़ दिया। अब जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम बढ़ रहे हैं तो पेट्रोल 77 रुपये पहुंच गया है।

रुला रहीं हैं दालें

आमतौर पर 40-50 रुपये में मिलने वाली दालें 100 रुपये के आसपास पहुंच जाती हैं तो सरकार की मूल्य नियंत्रण प्रणाली का कोई मतलब नहीं रह जाता है। गेंहूं, चावल, चीनी सहित रोजमर्रा की अन्य सभी महत्वपूर्ण वस्तुओं के मूल्यों में भी कमी नहीं हुई है। रिफाइन,सरसों सहित अन्य खाद्य तेलों की कीमतें भी आसमान पर हैं।  कागज पर तो महंगाई घटी है पर जमीनी हकीकत यह है कि वह बढ़ी है ,इसी कारण लोगों की बचत 6 फीसदी घटी है.

काला धन तो दूर देश का धन भी नहीं बचा पाए

नरेंद्र मोदी ने कालाधन देश में वापस लाने को लेकर चुनाव अभियान में खूब तालियां बटोरी थीं, लेकिन आज दो साल बाद  एक फूटी कौड़ी भी देश में नहीं ला सके हैं।

इसके उलट भारतीय बैंकों और वित्तीय संस्थानों को अरबों रुपये का चूना लगाकर लिकर किंग विजय माल्या बड़ी आसानी से देश से फरार हो गया और हमारी केंद्रीय एजेंसियां सोती रह गईं। इसके बाद पीएनबी बैंक में नीरव मोदी व मेहुल चोकसी ने अरबों रुपये का चुना लगाया।

नोटबंदी ने तोड़ी अर्थव्यवस्था की कमर

काला धन के खिलाफ नोटबंदी का जो आपरेशन किया गया उसने लोगों और अर्थव्यवस्था को नुकसान ही किया है। नोटबंदी बिना पर्याप्त तैयारी के हड़बड़ी में उठाया गया कदम था।

इसकी आलोचना से बचने के लिए कैशलेस का नारा बुलंद किया गया और नौकरशाही पर दबाव बनाकर इसे भी बिना आधारभूत सुविधाएं बढ़ाए ही जल्दबाजी में लागू करने की बेताबी दिखाई गई।

आज भी देश में हजारों गांव ऐसे हैं जहां पक्की सड़क नहीं पहुंची है, बिजली नहीं है और ना ही स्वच्छ पेयजल की सुविधा। ऐसे में पंचायतों को डिजिटल और कैशलेस करना दूर की कोड़ी है।

 किसानों की फिक्र नहीं, आत्महत्याएं करने को हैं मजबूर

पीएम मोदी भले ही अपने भाषणों में किसानों के हित में काम करने के लाख दावे करते रहते हों पर जमीनी हकीकत यह है कि देश के छोटे किसानों की हालत में कोई बदलाव नहीं आया है। आज भी फसलें चौपट होने और कर्ज के बोझ से दबने की वजह से हजारों किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं।

फसल बीमा योजना काफी अच्छी योजना है लेकिन इसका सही ढंग से लाभ  किसानों को नहीं मिल पा रहा है। सबसे खराब हालात महाराष्ट्र के हैं जहां राज्य सरकार भी भाजपा की ही है। 

गरीबी उन्मूलन दर की कौड़ी

गरीबी उन्मूलन के मामले में आनन-फानन में कुछ कर पाना संभव नहीं है फिर भी चार साल में केंद्र सरकार का कामकाज इस मामले में भी फिसड्डी ही कहा जाएगा। गरीबों की योजनाओं का लाभ अब भी आम आदमी तक कम ही पहुंच पा रहा है।

प्रशासनिक अधिकारी,नेता, ठीकेदार और बिचौलिये ही उनके हिस्से का अरबों रुपया हड़प जा रहे हैं। इनपर प्रभावी रूप से लगाम लगाने में केंद्र और राज्य सरकारें विफल रही हैं।

तत्कालीन मुद्दों पर भी खाई मुंह की

जाट और पटेल आरक्षण, जेएनयू-कन्हैया, कश्मीर एनआईटी, महिलाओं के मंदिर प्रवेश आदि मुद्दों पर भी केंद्र सरकार का रवैया निराश करनेवाला है। इन मामलों पर और बेहतर निर्णय या कार्रवाई की जा सकती थी।

सिर्फ मन की बात नहीं साहेब, काम भी तो दिखे

हमारे एक पूर्व पीएम मनमोहन सिंह थे उनकी सबसे बड़ी कमजोरी थी कि वे बेहद कम बोलते थे । इस कारण उन्हें लोग मजाक में मौन मोहन या मौनी बाबा तक कहने लगे।

अब एक नरेंद्र मोदी हैं वो इनके ठीक उलट हैं। ये जरूरत से ज्यादा बोलते हैं यानि बड़बोले हैं। ये दोनों ही स्थितियां खतरनाक हैं। इस मामले में भी बैलेंस होना चाहिए।

मोदी जी ने हर साल एक करोड़ युवाओं को नौकरी देने का वादा किया था पर 2 13 लाख नौकरी ही दे पाए हैं. इस मामले तो यह सरकार फिस्सडी साबित हुई है। नोटबंदी के दौरान भी काफी लोग बेरोजगार हुए थे।

विदेशी राष्ट्रों से संबंध बेहतर करने में कामयाबी

नरेंद्र मोदी ने पीएम बनने के बाद से कई विदेशी देशों की यात्रा की है। इस मामले में उन्होंने काफी कामयाबी हासिल की है। विदेशी यात्राओं के दौरान उनके फैन की दिवानगी भी देखने लायक रहती है लेकिन एक बात खलती है कि वे विदेशी मंचों पर भी जब बोलते हैं तो कई बार वे भूल जाते हैं कि यह कोई चुनावी सभा का मंच नहीं है वे देश के पीएम की हैसियत से बोल रहे हैं। कई ऐसे मुद्दों पर भी बोल जाते हैं जिनकी जरूरत विदेशी धरती पर नहीं होती है।

जहां तक भ्रष्टाचार जैसे कैंसर का सवाल है तो बेशक केंद्र सरकार के किसी मंत्री पर आरोप नहीं लगे हैं पर आम आदमी को इससे कोई राहत नहीं मिली है। उसका  आज भी छोटा से छोटा काम बिना रिश्वत के नहीं होता।

बेहतर विकास दर देश की आर्थिक विकास दर 7.1 है जो अच्छी कही जा सकती है, पर यह पिछली यूपीए की कथित तौर पर नाकाबिल सरकार के बराबर है। मोदी सरकार ने तो उससे बेहतर करने का वादा किया था। डॉलर के मुकाबले रुपया अपने न्यूनतम स्तर 64.5 रुपये प्रति डालर  पर है।

इस कड़ी में मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया, मुद्रा और डिजिटल इंडिया जैसी प्रारंभ की गई योजनाएं सही तौर पर धरातल पर नजर आएं इसकी काफी मह्तवपूर्ण जिम्मेदारी सरकार  की है। 

अब केंद्र या राज्य सरकारों का दायित्व बनता है कि वो इस आर्थिक प्रगति में महत्वपूर्ण भूमिका निभानेवाले मजदूरों और निम्न मध्यवर्ग के लोगों को इसका उचित हिस्सा दिलाने का प्रयास करें जिससे आम लोगों को रोटी,कपड़ा, मकान, शिक्षा, न्याय औऱ स्वास्थ्य सुविधआएं आसानी से मिल सकें।

मोदी सरकार का काम इन क्षेत्रों में दिखा

सबसे बढ़िया पहल प्रधानमंत्री उज्जवला योजना की रही। जमीनी स्तर पर सहायता पहुंची।

 स्वच्छ भारत मिशन- यह एक बढ़िया काम शुरू हुआ है। ग्रामीण क्षेत्रों में शौचालय निर्माण में तेजी आई है पर अधिकारी आनन-फानन में ओडीएफ घोषित करने में जल्दबाजी दिखाते हैं जबकि काफी काम बाकि रहता है।

 जन धनः इसमें बड़ी संख्या में आम लोगों के खाते खुले हैं पर बैंकों में कर्मचारियों की संख्या बढ़ाने की जरूरत है।

जीएसटी- जीएसटी एक अच्छी कर प्रणाली शुरू की गई है। लेकिन इसमें करों की दर कम की जानी चाहिए।

डिजिटल इंडिया- इसका असर साफ दिखाई दे रहा है। स्मार्टफोन व इंटरनेट इस्तेमाल करनेवालों की संख्या में अच्छा इजाफा हुआ है। लेकिन सदूर गांवों में नेटवर्क पहुंचाना बड़ी चुनौती है

 स्वास्थय बीमा योजना- यह इस साल के बजट की महत्वाकांक्षी योजना है। इस योजना को आम लोगों तक पहुंचाना बड़े चुनौती है। यह सबसे जरूरी है।

 पाकिस्तान के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक

स्टेटस सिंबल बनी लाल बत्ती के इस्तेमाल को सीमित करना।

तीन तलाक के मामले में मुस्लिम महिलाओं के हित में सरकार का कदम स्वागतयोग्य है।

 विदेशों से संबंध प्रगाढ़ हुए हैं। इसमें एक बात खटकती है कि पीएम मोदी सारी बैटिंग खुद ही कर रहे हैं विदेश मंत्री को मौका ही नहीं देते हैं।

भाजपा की यूएसपी पर कोई काम नहीं

अयोध्या में राम मंदिर निर्माण, कश्मीर से धारा 370 हटाने की कवायद और समान नागरिक संहिता, हिंदी भाषा को उसका उचित स्थान दिलाना जैसे मुद्दे ही भाजपा को पार्टी विद डिफरेंंस की संज्ञा दिलवाते रहे हैं लेकिन दुर्भाग्य से इन सभी मुद्दों पर इन चार साल में कुछ भी ठोस काम नहीं हुआ है।

हां कभी-कभार भाजपा का कोई तीसरे-चौथे दर्जे का नेता केवल बयानबाजी कर देता है बस। कश्मीर तो नासूर बन गया है उसका तो जल्दी आपरेशन होना चाहिए। पाकिस्तान पर भी और नकेल कसनी चाहिए। उसे अलग थलग करना चाहिए।

 केंद्र सरकार ने अपने पांच साल के कार्यकाल में से चार से अधिक समय पूरा कर लिया है लेकिन कुल मिलाकर उसके कामकाज का मूल्यांकन किया जाए तो ऐसा लगता है कि आम लोगों के लिए अच्छे दिन अभी भी दूर की ही कौड़ी हैं।  

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