चमकते चांद को टूटा हुआ तारा बना डालाः PMCH के ICU में मौत से जुझता हमारा ‘आइन्सटीन’

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वेशक बहुत ही मामूली आदमी का बेटा वशिष्ठ से आखिर क्या गलती हुई कि आज इस सिचुएशन में हैं? सिर्फ और सिर्फ यही कि उनके पोर-पोर में देशभक्ति घुसी थी। अमेरिका का बहुत बड़ा ऑफर ठुकरा कर अपनी मातृभूमि की सेवा करने चले आए और देश-प्रदेश की छाती पर पहले से बैठे कुपुत्रों ने उनको पागल बना दिया। वह वशिष्ठ पागल हो गया। जो गणित में आर्यभट्ट व रामानुजम का विस्तार माना गया। जिनके चलते पटना विश्वविद्यालय को अपना कानून बदलना पड़ा था। इस चमकीले तारे के खाक बनने की लम्बी दास्तान है………….”

इंडिया न्यूज रिपोर्टर डेस्क।  सरकारी उपेक्षा की वजह से बिहार की इस महान धरोहर को सिजोफ्रेनिया का शिकार होना पड़ा। जी हां हम बात कर रहे है महान गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह की।

पीएमसीएच के आईसीयू में भर्ती इस इंसान रूपी इस कम्प्यूटर ने जाने कितने गणित के फॉर्मूले दिए होंगे जिसे अमेरिका से लेकर रसिया तक जापान से लेकर फ्रांस तक ने लोहा माना है।

कॉलेज से लेकर आईआईटी और नासा तक का सफर करने वाले अल्बर्ट आइंस्टीन के सिद्धांत को चुनौती देने वाले इस महान शख्सियत की हालत बहुत ही नाज़ुक है। अभी वह इमरजेंसी की मेडिकल आईसीयू में भर्ती हैं। आज इस शख्स को देखकर हैरानी होती है कि सरकारें इतनी निष्ठुर कैसे हो जाती हैं।

तकरीबन 45 साल से मानसिक बीमारी स्कीजोफ्रेनिया से पीड़ित, गुमनामी में जी रहे वशिष्ठ बाबू की ज़िंदगी एक बहुमूल्य प्रतिभा के बर्बाद हो जाने, हमारी असफ़ल सरकारों और सामाजिक स्तर पर हम सबके पतन की कहानी है।

डॉ. वशिष्ठ ने भारत आने पर इंडियन इन्स्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (कोलकाता) की सांख्यिकी संस्थान में शिक्षण का कार्य शुरू किया। कहते हैं यही वह वक्त था, जब उनका मानसिक संतुलन बिगड़ा।

वे भाई-भतीजावाद वाली कार्यसंस्कृति में खुद को फिट नहीं कर पाए। कई और बातें हैं। शोध पत्र की चोरी, पत्नी से खराब रिश्ते …, दिमाग पर बुरा असर पड़ा। फिर सरकार और सिस्टम की बारी आई। नतीजा सामने है।”

बिहार के भोजपुर ज़िले के बसंतपुर गांव में वशिष्ठ नारायण सिंह का जन्म 2 अप्रैल 1942 को हुआ था। पिता लाल बहादुर सिंह कॉन्सटेबल थे और संतान 5 थी। यानी कमाई कम थी लेकिन ख़र्चा ज्यादा था, जिसके चलते गरीबी का साया हमेशा से घर पर रहा।

लेकिन इस तंगी में भी वशिष्ठ नारायण सिंह ने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया और महान वैज्ञानिक आंइस्टीन के सापेक्ष सिध्दांत को चुनौती दी।

पटना साइंस कॉलेज में बतौर छात्र ग़लत पढ़ाने पर वह अपने गणित के अध्यापक को टोक देते थे। कॉलेज के प्रिंसिपल को जब पता चला तो उनकी अलग से परीक्षा ली गई।

जिसमें उन्होंने सारे अकादमिक रिकार्ड तोड़ दिए। पांच भाई-बहनों के परिवार में आर्थिक तंगी हमेशा डेरा जमाए रहती थी। लेकिन इससे उनकी प्रतिभा पर ग्रहण नहीं लगा।

वशिष्ठ नारायण सिंह जब पटना साइंस क़ॉलेज में पढ़ते थे तभी कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जॉन कैली की नज़र उन पर पड़ी। कैली ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और 1965 में वशिष्ठ नारायण अमरीका चले गए।

साल 1969 में उन्होंने कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी से पीएचडी की और वॉशिंगटन विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर बन गए। नासा में भी काम किया लेकिन मन नहीं लगा और 1971 में भारत लौट आए।

पहले आईआईटी कानपुर, फिर आईआईटी बंबई, और फिर आईएसआई कोलकाता में नौकरी की। इस बीच 1973 में उनकी शादी वंदना रानी सिंह से हो गई। घरवाले बताते हैं कि यही वह वक्त था जब वशिष्ठ जी के असामान्य व्यवहार के बारे में लोगों को पता चला।

साल 1974 में उन्हें पहला दौरा पड़ा, जिसके बाद शुरू हुआ उनका इलाज। जब बात नहीं बनी तो 1976 में उन्हें रांची में भर्ती कराया गया। घर वालों के मुताबिक़ इलाज अगर ठीक से चलता तो उनके ठीक होने की संभावना थी। लेकिन परिवार ग़रीब था और सरकार की तरफ से मदद कम।

1987 में वशिष्ठ नारायण अपने गांव लौट आए। लेकिन 89 में अचानक ग़ायब हो गए। साल 1993 में वह बेहद दयनीय हालत में डोरीगंज, सारण में पाए गए। पागल हालत में जूठे पत्तल से खाना खाते हुए।

आज वशिष्ठ नारायण सिंह फिर चर्चा में हैं। वह बीमार हैं। वह अपने भाई के परिवार के साथ रहते हैं। अभी PMCH के ICU में हैं। उनकी हालत सिस्टम के मुंह पर तमाचा है।

एक बार उनके ऊपर फिल्म बनने की भी बात हुई थी। लेकिन अभी जो व्यक्ति जीवित है, उसकी कदर हम नहीं कर पाए तो फिल्म में उसकी महानता को कैसे देख सकेंगे?

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