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घाटी का आतंकी फिदायीन जैश का ‘अफजल गुरू स्क्वॉड’

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“इस स्क्वॉड का मकसद ही है ‘मारो और मर जाओ’। यही वजह है कि यह संगठन घाटी में मौत का सौदागर बनता जा रहा है। इस संगठन के आंतकी हमेशा मौत को गले लगाने को तैयार रहते हैं….”

INR. देश का अब तक का सबसे बड़ा आतंकी हमला कश्मीर के पुलवामा में हुआ जिसमें सीआरपीएफ के 40 से ज्यादा जवान एक झटके में शहीद हो गए। उन्हें मोर्चा तक संभालने का मौका नहीं  मिला।

देश भर में इस आतंकी घटना का आक्रोश लोगों में देखा जा रहा है। जवानों का खून इस घटना के बाद से बदला  लेने को खौल रहा है।

पुलवामा में हुए सीआरपीएफ के जवानों पर हुए आतंकी हमले की पटकथा भले ही सरहद पार लिखी गई हो। लेकिन इस हमले के बाद तस्वीर साफ हो चुकी है कि जैश के आतंकियों ने मौत का सौदा इसी कश्मीर घाटी में तैयार किया था।

इस आंतकी हमले को अंजाम देने वाला फिदायीन जैश का अदील अहमद डार बताया जाता है जिसने 2008 में जैश में शामिल हुआ था।

बताया जाता है कि सेना के पास जनवरी के मध्य से ही इनपुट मिलने लगा था कि एलओसी पार से जैश के फिदायीन सरहद पार कर घाटी में घुस चुके है तथा किसी बड़े आंतकी हमले की फिराक में है।

10 फरवरी तक सेना के पास आंतकी हमले को लेकर कई इनपुट आते गए। यहाँ तक कि 13 फरवरी देर रात भी सेना को इनपुट मिला था कि फिदायीन हमला किसी सुरक्षा बलों के काफिले पर हो सकता है।

जब तक सेना इन प्राप्त इनपुट को विश्वसनीय मानते हुए सुरक्षा को लेकर सतर्क होती तब तक आंतकी अपने मंसूबे में कामयाब हो गए।

जम्मू कश्मीर के पुलवामा में हुए आतंकी हमले के पीछे जैश-ए-मोहम्मद के अफजल गुरू स्क्वॉड का नाम सामने आ रहा है।

कभी कश्मीर में आतंक का पर्याय माना जाने वाले लश्कर -ए-तोएबा और हिजबुल मुजाहिदीन की तूती बोलती थी। लेकिन अब उनकी जगह पिछले कई सालों से जैश ने ले रखा है।

पिछले कई सालों में इसने कश्मीर और कश्मीर से बाहर कई हमलों में शामिल रहा है। यह संगठन अपने आत्म घाती हमले के लिए जाना जाता है। इसके घातक होने की सबसे बड़ी वजह माना जाता है। इसका फिदायीन दस्ता। सिर्फ जनवरी में ही इसने कई हमले किए है।

इससे पहले पिछले साल 10 फरवरी को जम्मू शहर के आर्मी कैंप पर इस स्क्वॉड के फिदायीन यूनिट ने हमला किया था। इस हमले से एक दिन पूर्व ही अफजल गुरू की बरसी थी।

10 जनवरी को भी पुलवामा के लेथलपुरा में पैरामिलिट्री कैंप पर इसी स्क्वॉड का एक फिदायीन जा भिडा था। लाल चौक पर हुए हमले में भी जैश ने जिम्मेवारी ली थी।

इस हमले में पुलिस और सीआरपीएफ के सात जवान घायल हुए थे। इसके अलावा दो साल पूर्व 30-31 दिसम्बर को भी पुलवामा में बीएसएफ के जवानों पर हुए हमले में भी जैश का नाम आया था।

बताया जाता है कि इस स्क्वॉड का नाम संसद हमले के दोषी अफजल गुरु के नाम पर रखा गया है। इसके में कहा जाता है कि हमले की योजना यह अपनी मर्जी से बनाता है।

पिछले कई सालों में इसने कश्मीर और कश्मीर से बाहर यहां तक कि विदेशों में भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुकी है। कश्मीर का दूर-दराज का इलाका तंगधार हो या राजधानी श्रीनगर या फिर पंजाब का पठानकोट हो या अफगानिस्तान का मजार-ए-शरीफ।

इस स्क्वॉड ने पैरामिलिट्री फोर्सेज और सेना के अहम् ठिकानों को निशाना बनाया है। हर हमले के बाद जैश के सदस्य अपने सबूत जानबूझकर छोड़ देता है।

इस स्क्वॉड की बदौलत ही आंतकी मसूद अजहर ने घाटी में लश्कर ए तोएबा और हिजबुल मुजाहिदीन को भी पीछे छोड़ दिया है। जिसका जीता जागता सबूत है पुलवामा में हुए फिदायीन हमला जिसमें सीआरपीएफ के 40 से ज्यादा जवान शहीद हो गए।

इससे पहले की जैश की यह फिदायीन संगठन अपना अगला निशाना बनाए सरकार को चाहिए कि ऐसे आंतकी संगठन के खिलाफ सख्त से सख्त कदम उठाएँ। देश की जनता की भी यही आवाज है।

इस बार देश की जनता की आवाज को सरकार को सुनना ही होगा। आखिर कब तक  हमारे जवान ऐसे फिदायीन हमलों के शिकार होते रहेंगे। अब और नही, बस हुआ !

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