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गुजरात से बिहार आकर मुर्दों की बस्ती में इंसाफ तलाशती एक बेटी

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अब मुर्दों से नहीं ऊपरवाले के इंसाफ पर भरोसा है। बड़ी उम्मीद के साथ बिहार आई थी। आते वक्त कई जगहों पर बड़े-बड़े अक्षरों में स्लोगन लिखे थे, बिहार में बहार है, नीतीशे कुमार है। ‘बेटी बचाओ,बेटी पढ़ाओ’…..”

INR. पीएम मोदी के गुजरात के सूरत शहर से सीएम नीतीश के बिहार के मधुबनी के साहरघाट में पिछले 15 दिनों से इंसाफ की गुहार लगा कर थक चुकी अनीता ने कहा कि यह मुर्दों की बस्ती है। न पुलिस, न जनप्रतिनिधि, न मीडिया और न समाज के लोगों ने उसकी मदद की।

कितनी शर्मनाक बात है कि एक बेटी सूरत से आकर 15 दिनों तक इंसाफ की भीख मांगती रही, पर बिहार के मधुबनी में इंसाफ मिलने की बात तो दूर किसी ने सांत्वना तक नहीं दिया।

पहले तो कुदरत ने उसे विधवा बना दिया। सड़क दुर्घटना में पति की मौत हो गई। जिंदगी के तमाम रंग बदरंग हो गए। पति के गुजर जाने के छह साल तक वह अपनी जिन्दगी के नखरे को सहने की आदत डाल ली थी।

इसी बीच शांत हो चुकी जिन्दगी में एक तूफान लेकर मधुबनी जिला के साहरघाट थाने के सोवरौली गांव के रमेश सिंह का बेटा प्रवीण सिंह आया। प्रवीण सिंह उन दिनों सूरत शहर में ही बिजनेस करता था।

उसने अनीता से कहा कि उसकी पत्नी जल कर मर गयी है। उससे अनीता अगर शादी कर लेती है,तो उसके बच्चे को मां का प्यार मिल जाएगा,और विधवा अनीता के बच्चों को बाप का।

यह बात प्रवीण सिंह ने अनीता से झूठ कहा था। उसकी पहली पत्नी आज भी जीवित है। प्रवीण सिंह के एक झूठ ने अनीता की जिन्दगी को बर्बाद कर दिया। शादी होते ही पहले पति के घर के दरवाजे अनीता के लिए हमेशा के लिए बंद हो गए।

शादी के बाद सात महीने तक प्रवीण सिंह अनीता के साथ रह कर पति का फर्ज निभाता रहा। मौका मिला तो छह लाख रुपये लेकर प्रवीण सिंह सूरत से अपने गांव भाग आया। प्रवीण सिंह से अपना पैसा और पत्नी का अधिकार लेने बिहार आयी अनीता सिंह की मदद किसी ने नहीं की।

और तो और, नेताजी चौक के बगल में रहने वाली इस बदनसीब महिला की मदद किसी नेता ने भी नहीं की। पिहवारा पंचायत के तमाम पंचायत प्रतिनिधियों ने यह कह कर अपने हाथ खड़े कर लिए कि उन्हें मदद कर अपने वोट खराब नहीं करने हैं।

साहरघाट थाने पर दो दिन इस मुद्दे पर हुई पंचायत में अगुआई करने वाले तमाम चेहरे आज पिहवारा पंचायत के ग्राम कचहरी के सरपंच के दरवाजे पर बैठी अनीता के सामने झुके हुए थे। इसमें कोई पूर्व मुखिया तो कोई पंचायत समिति सदस्य के चेहरे थे।

स्वीकार तो कैमरे के सामने सबों ने किया कि अनीता के साथ प्रवीण सिंह ने नाइंसाफी की है। लेकिन,खुल कर साथ देने के मुद्दे पर राजनीति की याद आ गयी। हालांकि अनीता का कहना है कि वो हर हाल में अपना अधिकार लेकर रहेगी।

यही नहीं इस महिला ने न सिर्फ थाने में बल्कि मधुबनी के एसपी और बेनीपट्टी डीएसपी से भी लिखित गुहार लगा चुकी है। सब ने यह कह कर कि इस मामले में यहां की पुलिस कुछ नहीं कर सकती,क्योंकि मामला गुजरात में दर्ज है।

यह बात न सिर्फ साहरघाट पुलिस बल्कि जिले के पुलिस कप्तान भी यही कह रहे हैं। जबकि उस महिला ने दावे के साथ दिए गए आवेदन में कहा है कि उसकी ओर से सूरत में कोई एफआईआर दर्ज नहीं कराया गया है। यही बात कदोदरा थाने में पदस्थापित पुलिस मनोहर भाई ने भी कही।

मनोहर भाई ने कहा कि अनीता की ओर से थाने में कोई एफआईआर दर्ज नहीं किया गया है,बल्कि एक आवेदन दिया गया था। उसी आवेदन के आलोक में प्रवीण सिंह के पिता सोवरौली निवासी रमेश सिंह ने बांड बनाया कि हम 15 दिनों में प्रवीण सिंह को अनीता को सौंप देंगे।

अगर 15 दिनों में ऐसा नहीं कर सके तो 17 वें दिन उसके बच्चे सहित बहू के रूप में सम्मानपूर्वक स्वीकार करेंगे। यह बांड प्रवीण सिंह के पिता रमेश सिंह ने 3 नवम्बर, 2017 को गुजरात पुलिस के समक्ष बनाया था।

बीच में कई बार फोन पर अनीता की बात रमेश सिंह से हुई, जिसका कॉल रिकार्ड अनीता ने संभाल कर रखे हैं। जब रमेश सिंह अपने वादे से मुकर गया तो अनीता ने वह बांड पेपर लेकर अपना अधिकार पाने बिहार आ गयी।

जिस बिहार में सुशासन के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, उस बिहार के दारोगा की बात क्या है? जब मधुबनी के एसपी दीपक बरनवाल ने भी कोई नोटिस नहीं ली, जबकि यह महिला एसपी से मिलने दो दिन एसपी कार्यालय गयी। दुर्भाग्य उसका कि एसपी मधुबनी से अनीता की मुलाकात नहीं हुई। 

हालांकि फोन पर पूरी जानकारी एसपी मधुबनी को भी दी थी और शुक्रवार को जब फरियादियों से एसपी के मिलने के तय समय पर गयी तो एसपी नहीं मिले,पर एक महिला पुलिस अधिकारी ने आवेदन ले लिया और कहा कि आप कल यानि शनिवार को बेनीपट्टी के डीएसपी से मिलिएगा,आपका काम हो जाएगा।

शनिवार को वह बेनीपट्टी के डीएसपी कार्यालय से भी निराश लौट गई। साहब ने कहा हम आपकी कोई मदद नहीं कर सकते। क्योंकि मामला गुजरात में दर्ज है। अब इसे क्या कहियेगा?

आखिर,सुशासन की पुलिस सच जानने का प्रयास 15 दिन बाद भी क्यों नहीं किया? एसपी या पुलिस के आलाधिकारी की नीयत मदद करने की होती तो गुजरात पुलिस से मामले का सच जाना जा सकता था।

लेकिन,किसी ने न तो अनीता की बात को सच मान कर उसकी मदद की और न झूठ मानकर गुजरात पुलिस से सम्पर्क कर सच जानने का प्रयास किया। ऐसे मामलों को लेकर स्थानीय अखबारों या न्यूज चैनलों में भी कोई सुर्खियां पढ़ने-देखने को नहीं मिली

बताईये साहरघाट के दारोगा के अलावे इस मामले में एसपी और डीएसपी की भूमिका भी महिला उत्पीड़न के मामले में सवालों के घेरे में है या नहीं? आखिर,महिला के दावों की पड़ताल किए बिना मदद से इंकार कर दिए जाने का औचित्य क्या है?       

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