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…और जार्ज साहब बन गए यूं डाइनामाइट लीडर

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अलविदा जार्ज फर्नांडिस…..

INR (नवीन शर्मा)। जार्ज फर्नांडिस ऐसे राजनेता थे जिनकी विचारधारा से भले आप सहमत.ना हों पर उनके जुझारू और काफी हद तक ईमानदार व्यक्तित्व के कायल हुए बिना नहीं रह सकते।

एक समय था जब बाम्बे के मजदूर यूनियन में जार्ज का सिक्का चलता था। उनके एक आवाज पर मुंबई ठहर जाती थी। पिछले कई साल से जार्ज की तबीयत ज्यादा खराब थी आज उन्होंने अंतिम विदाई ली। अभी दो दिन पहले ही ठाकरे फिल्म में जार्ज फर्नांडिस का भी छोटा सा किरदार देखा था तो उनकी याद आई थी।

कई भाषाओं के थे जानकारः जॉर्ज फर्नांडिज का जन्‍म भले ही कर्नाटक के मंगलूर में हुआ हो लेकिन उनकी कर्मभूमि महाराष्‍ट्र और बिहार रही।

हिंदी, अंग्रेजी, तमिल, मराठी, कन्नड़, उर्दू, मलयाली, तेलुगु, कोंकणी और लैटिन के जानकार जॉर्ज फर्नांडिस की छवि एक ऐसे विद्रोही नेता की थी जो अपनी धुन का पक्‍का था। उनका पूरा जीवन विवादों से भरा रहा।

बाम्बे में ट्रेड यूनियन नेता बने, जायंट किलरः जॉर्ज फर्नांडिस को उनके परिजनों ने पादरी बनाने के लिए बेंगलुरु भेजा था लेकिन वह मुंबई चले आए। यहां वे उन्होंने एक ट्रेड यूनियन के नेता के रूप में अपना राजनीतिक जीवन शुरू किया।।

1950 और 60 के दशक में ट्रेड यूनियन लीडर के रूप में उनकी लोकप्रियता चरम पर थी। उन्‍होंने वर्ष 1967 में कांग्रेस के दिग्‍गज नेता एसके पाटील को दक्षिण मुंबई सीट पर हुए लोकसभा चुनाव में हरा दिया। इसके बाद वे ‘जाइंट किलर’ के नाम से मशहूर हो गए।

रेलवे की यूनियन से जुड़ेः रेल यूनियन से भी जुड़े थे। वर्ष 1974 की रेल हड़ताल के बाद वह कद्दावर नेता के तौर पर उभरे। फर्नांडिस एक फायर ब्रैंड नेता थे और करीब चार दशक तक मुंबई के ट्रेड यूनियन में सक्रिय रहे। वे समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया के काफी नजदीक थे। उन्‍होंने सोशलिस्‍ट आंदोलन को पूरे महाराष्‍ट्र में मजबूत किया। 

1973 में ऑल इंडिया रेलवे मेंस फेडरेशन के अध्यक्ष बने। उन्होंने रेलवे के कर्मचारियों की मांगों को लेकर देशव्यापी हड़ताल कर रेलवे का चक्का जाम कर दिया था। इससे देश में रेलवे का संचालन पूरी तरह से ठप हो गया था।

फर्नांडिस अपने शुरुआती दौर से ही जबरदस्त विद्रोही नेता के तौर पर रहे हैं। राम मनोहर लोहिया को वो अपना आदर्श मानते थे। सोशलिस्ट पार्टी और ट्रेड यूनियन आंदोलन के में फर्नांडिस बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते थे।

आपातकाल के हीरो, कभी मछुआरा तो कभी सिख बनेः जिस समय आपातकाल की घोषणा हुई जार्ज फर्नांडिस अपने परिवार के साथ ओडिशा में थे। परिवार से अलग होकर आपातकाल के खिलाफ आंदोलन का हिस्सा बने।

फर्नांडिस कभी मछुआरा बनकर तो कभी साधु का रूप धारण कर देश में अलग-अलग हिस्सों में घूमते रहे। इतना ही नहीं उन्होंने अपने बाल और दाढ़ी इतने बढ़ा लिए और सिख बनकर आपातकाल के खिलाफ आंदोलन को धार देने लगे।

डायनामाइट मैनः फर्नांडिस देश की तमाम सुरक्षा एजेंसियों से छिपकर अपने मिशन पर लगे रहे. इसी दौरान उन्होंने जनता के नाम एक अपील भी जारी की थी।

आरोप है कि आपातकाल की घोषणा के बाद से ही जॉर्ज फर्नांडिस देश के अलग-अलग हिस्से में डायनामाइट लगाकर विस्फोट और विध्वंस करना चाहते थे। इसके लिए ज्यादातर डायनामाइट गुजरात के बड़ौदा से आया पर दूसरे राज्यों से भी इसका इंतजाम किया गया था।

इसी बाद फर्नांडिस  और उनके साथियों को जून 1976 में गिरफ्तार कर लिया गया। इन सभी लोगों पर सीबीआई ने मामला दर्ज किया, जिसे बड़ौदा डायनामाइट केस कहा जाता है।

जेल में रह कर चुनाव जीता बने मंत्रीः आपातकाल के दौरान फर्नांडिस को जेल में डाल दिया गया। 1977 का लोकसभा चुनाव उन्होंने जेल में रहते हुए बिहार की मुजफ्फरपुर लोकसभा सीट से लड़ा। वे रिकॉर्ड मतों से जीतकर संसद पहुंचे। जनता पार्टी की  सरकार बनी तो वो मंत्री बने।

कोकाकोला को देश से बाहर कियाः केंद्रीय उद्योग मंत्री के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान, उन्होंने निवेश के उल्लंघन के कारण, अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों आईबीएम और कोका-कोला को देश छोड़ने का आदेश दिया।

रेल मंत्री बनेः वह 1989 से 1990 तक रेल मंत्री के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान कोंकण रेलवे परियोजना के पीछे प्रेरणा शक्ति थी।

रक्षामंत्री बने, कारगिल युद्ध जीताः वह राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार (1998-2004) में रक्षा मंत्री थे, जब कारगिल युद्ध भारत और पाकिस्तान और भारत ने पोखरण में परमाणु परीक्षण किए एक अनुभवी समाजवादी, फ़र्नान्डिस को बराक मिसाइल घोटाले और तहलका मामले सहित कई विवादों से डर लगा था। जॉर्ज फ़र्नान्डिस ने 1967 से 2004 तक 9 लोकसभा चुनाव जीते।

समता पार्टी बनाईः  उन्होंने समता पार्टी का गठन किया, जिसका बाद में जेडीयू में विलय कर दिया गया। वो राजनीतिक जीवन में 9 बार सांसद चुने गए।

विवादों से भरा रहा सार्वजनिक जीवनः जॉर्ज फर्नांडिस का पूरा सार्वजनिक जीवन विवादों से भरा रहा। आपातकाल के दौरान उन पर अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए और फ्रांस सरकार से मदद लेने का आरोप लगा।

1975 के बड़ोदरा डायनामाइट केस की साजिश के बाद उन्‍हें दिमाग ‘बाबा’ कहा जाने लगा था। जॉर्ज फर्नांडिस ने अपने डायनामाइट केस को याद करते हुए दावा किया था कि उस मामले में कुछ सच्चाई थी, मगर बहुत कुछ बढ़ा-चढ़ा कर लिखा गया।

तहलका कांडः वाजपेयी सरकार के दौरान हुए तहलका कांड में उनकी सहयोगी जया जेटली का नाम आया। इसके बाद फर्नांडिस को रक्षा मंत्री के पद से इस्‍तीफा देना पड़ा। जॉर्ज फर्नांडिस का नाम कथित बराक मिसाइल घोटाले में भी आया।

अटल सरकार में रक्षा मंत्री रह चुके जॉर्ज फर्नांडिस को एक ऑफिशल ट्रिप के दौरान वॉशिंगटन के एक एयरपोर्ट पर रोका गया था। 2003 में उनको दोबारा रोका गया, तब वह ब्राजील जा रहे थे।

जॉर्ज फर्नांडिस की देखरेख को लेकर कानूनी जंगः जॉर्ज फर्नांडिस के बीमार होने के बाद भी विवादों ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। जॉर्ज फर्नांडिस की देखरेख को लेकर कानूनी जंग छिड़ गई।

बाद में दिल्ली हाई कोर्ट ने फैसला दिया कि पूर्व केंद्रीय मंत्री अपनी पत्नी लैला कबीर के साथ ही रहेंगे और उनके भाई उनसे मिलने जा सकते हैं। फैसला देने से पहले जस्टिस वी.के. शाली ने अल्जाइमर से पीड़ित 80 वर्षीय फर्नांडिस से आमने-सामने बात की।

एक बार जॉर्ज फर्नांडिस ने कहा था कि तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने बोफोर्स की फाइल को हाथ न लगाने की बात कही थी। हालांकि बाद में उन्‍होंने सफाई दी कि वाजपेयी ने उनसे यह बात मजाक में कही थी।

फर्नांडिस ने कहा कि सब जानते हैं कि वाजपेयी किस तरह मजाक करते हैं, फाइल को न छूने वाली बात भी उन्होंने मजाक में ही कही थी।

उन पर सोशलिस्‍ट पार्टी को तोड़ने का आरोप लगा। वह लंबे समय तक समाजवादी आंदोलन से जुड़े रहे। समाजवादी नेता मधु लिमये के साथ मिलकर फर्नांडिज ने मुंबई में ट्रेड यूनियन की राजनीति की और समाजवादी आंदोलन को आगे बढ़ाया।

वह जिन सांप्रदायिक शक्तियों के खिलाफ आवाज उठाते रहते थे, उसी के साथ बाद में हाथ मिला लिया। उनके अंदर राजनीतिक और वैचारिक अस्थिरता थी। हालांकि वह अपनी धुन में चलने वाले नेता थे।

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