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एक सटीक विश्लेषणः नीतीश कुमार का अगला दांव क्या है ?

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“बिहार की जातिवादी राजनीति, जहां नीतीश कुमार छोटे पड़ जाते हैं। वो जिस जाति से आते हैं उनकी संख्या बमुश्किल 4 प्रतिशत है।जातिवादी राजनीति को साधने के लिए ही नीतीश कुमार ने दलित को दो फाड़ कर महादलित बनाया और सवर्णों में भूमिहार को अपने से जोड़कर रखा। बिहार में कहावत भी है, ताज कुर्मी का और राज भूमिहार का…”

एक्सपर्ट मीडिया न्यूज नेटवर्क।  नीतीश कुमार की पार्टी JDU मोदी सरकार की मंत्रिपरिषद में शामिल नहीं हुई ! यह फैसला खुद नीतीश कुमार का था कि उनकी पार्टी एलाइंस में शामिल है, लेकिन मंत्रिपरिषद में शामिल नहीं होगी।

विश्लेषकः धनंजय कुमार मुंबई के जाने माने फिल्म-टीवी लेखक हैं और वे मूलतः बिहार के नालंदा जिले के बिंद क्षेत्र निवासी हैं…..

इस बात के लोग अलग अलग मायने निकाल रहे हैं! कुछ लोग कह रहे हैं, नीतीश कुमार दो पद चाह रहे थे, मोदी जी ने नहीं दिया। कुछ कह रहे हैं नीतीश जी को मोदी शाह अब उनकी औकात दिखाएँगे, चुनाव से पहले बड़ी अकड़ दिखा रहे थे, बीजेपी को पिछली बार जीती पांच लोकसभा सीटों को छोड़ना पड़ा था, अब जब बीजेपी को अकेले बहुमत आ गया तो उसका हिसाब तो चुकाएगी ही।

लेकिन नीतीश कुमार चुप हैं और ना ही बीजेपी कुछ बोल रही है। कयास लगाने वाले ये भी कह रहे हैं कि नीतीश कुमार फिर पलटी मारेंगे। कुछ कह रहे हैं नीतीश कुमार का खेल ख़त्म हो गया, राजद अपने साथ जोड़ने से रहा, झक मारकर उन्हें बीजेपी में ही रहना है। इसलिए जैसे मोदी शाह चाहेंगे, वैसे रहना होगा। यानी जितने लोग उतनी बातें। सबके अपने अपने कयास हैं। लेकिन वास्तविकता क्या है ?

राजनीति के मौजूदा दौर में नैतिकता की राजनीति लगभग समाप्त हो गयी है। नैतिकता प्रेमी नेता चुनाव जीत नहीं सकता। जीत के लिए साम दाम दंड भेद सब जायज है।

मतलब येन केन प्रकारेण जीत चाहिए और सत्ता की सबसे ऊंची कुर्सी चाहिए, यही नेता का लक्ष्य है। नीतीश कुमार अलग कैसे हो सकते हैं ? और फिर अवसरवाद राजनीति का सबसे ज़रूरी और महत्वपूर्ण हथियार है। जो अवसर का लाभ नहीं उठाता वो पराजित होता है। इसलिए नीतीश कुमार भी अलग नहीं हैं। लेकिन नीतीश कुमार अलग हैं, तभी तो संगठन और वोट बैंक ना होने के बावजूद 2005 से बिहार जैसे घोर जातिवादी प्रदेश में मुख्यमंत्री पद पर विराजमान हैं !

वह जिस जाति से आते हैं, बिहार में उसका वोट प्रतिशत बमुश्किल 4 प्रतिशत है। जबकि यादव, मुस्लिम और सवर्ण जातियां बहुत अधिक हैं। फिर भी नीतीश कुमार अजेय की तरह बिहार की राजनीति में अपना दम मनवा रहे हैं। वो जिधर घूमते हैं जीत उस तरफ घूम जाती है। इसलिए जब पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी से अलग होकर राजद के साथ जुड़े तो बीजेपी हार गयी और हारी हुई पार्टी राजद फिर से सत्ता में आ गयी।

इससे पहले जबतक नीतीश कुमार बीजेपी के साथ रहे बीजेपी सत्ता भोगती रही। मतलब जिधर नीतीश कुमार उधर सत्ता, यही बिहार की राजनीति है। नीतीश कुमार वन मैन आर्मी हैं, समता पार्टी जब बनी थी तब नीतीश कुमार सत्ता में नहीं थे और राज्य की राजनीति में उनकी पकड़ वैसी नहीं थी, जैसी आज है, लेकिन तब भी भले जार्ज पार्टी के अध्यक्ष थे, नीतीश सबसे मजबूत कड़ी थे।

बिहार की राजनीतिक ज़मीन और वोट बैंक पर सबसे ज्यादा उनकी ही पकड़ थी। ईमानदार छवि भी सदा उनकी बड़ी सहयोगी रही। बिहार एक तरफ लालू के परिवारवाद, उनकी तानाशाही प्रवृति और क़ानून व्यवस्था के लगभग समाप्त हो जाने से त्रस्त था, वहीं नीतीश कुमार राजनीति की पुरानी नैतिक परंपरा परिवारवाद से दूर थे, जैसा कि आज भी हैं।

फिर क़ानून व्यवस्था को भी काफी हद तक सुधारा। सड़क और बिजली गाँव गाँव तक पहुंचाने का काम किया। और आम आदमी के दिलों में ये विश्वास बनाने में कामयाब हो गए कि लालू से बेहतर विकल्प नीतीश हैं।

लालू यादव लगातार पिछले 13 साल से बिहार की सत्ता से बाहर हैं। उनकी छवि एक संभावनाशील राजनेता के तौर पर समाप्त हो चुकी है। नीतीश के साथ कुछ साल के लिए लालू जी पार्टी बिहार की सत्ता में आई भी तो किसी और नेता को उपमुख्यमंत्री बनाने के बजाय अपने बेटे को आगे बढाने का काम किया, लिहाजा वंशवाद का आरोप उनपर और गहरा हुआ और उनके माई वोट में भी दरार पड़ी।

नतीजा सामने है कि लालू जी की पार्टी को लोकसभा के चुनाव में एक सीट नहीं मिली। उनकी बेटी मीसा तो हारी ही पार्टी के वरिष्ठ नेता भी हार गए। लालू जी अभी जेल में हैं और पार्टी की कमान तेजस्वी संभाल नहीं पा रहे हैं। तेजप्रताप रोज़ नौटंकी करके तेजस्वी और लालू की छवि खराब कर रहे हैं सो अलग। नीतीश कुमार के अन्य विरोधी नेता मांझी, कुशवाहा भी अपनी लाज बचा न सके। ऐसे में नीतीश कुमार बिहार के एकछत्र नेता के तौर पर अब भी कायम हैं।

बहरहाल, नीतीश कुमार का विकल्प बिहार में भले कोई दूसरा न दिख रहा हो, लेकिन वह सर पर निष्कंटक ताज रखकर चैन की बांसुरी नहीं बजा रहे हैं। उनके सामने कई चुनौतियां हैं। बाहर भी और भीतर भी। बाहर की चुनौती के तौर पर सबसे बड़ी चुनौती है

दूसरी बात है उनकी जाति के लोग, जो पहले किसान थे, अब खेती के बजाय पढ़ाई और उसके बाद नौकरी पाना उनका लक्ष्य है। इस वजह से गाँवों से निकलकर लोग देश के अलग अलग हिस्सों में जाकर नौकरी कर रहे हैं और वहीं बस भी जा रहे हैं।

उनके गृह जिले नालंदा की ही बात करें, (नालंदा बिहार की सबसे बड़ी कुर्मी आबादी का जिला है) तो वहाँ अब शायद ही कोई गाँव हो, जहाँ कुर्मी परिवार के लड़के संख्या में अधिक हों। और जो बचे भी हैं, वो या तो टपोरी हैं या गरीब।

ऐसे में नीतीश कुमार जाति के आधार पर राजनीति कर पायेंगे ये उनके लिए संभव नहीं है। नालंदा की सीट जीतने के लिए भी ये ज़रूरी हो जाता है कि कोई दूसरा बड़ा कुर्मी उम्मीदवार किसी और पार्टी से भी खड़ा ना होने पाए। और उसके बाद भी अपने उम्मीदवार को जिताने के लिए उन्हें प्रखंड स्तर पर मीटिंग करनी पड़ती है। और किसी तरह उनकी प्रतिष्ठा बच जाती है।

भूमिहार में संभावना तलाशने या कहें तलाशते रहने की मूल वजह ये है कि लालू राज में सबसे ज्यादा मुश्किलें भूमिहार समाज को झेलनी पड़ीं। नब्बे के दशक में हुए ज्यादातर नरसंहारों में भूमिहारों को निशाना बनाया गया और फिर भूमिहारों ने रणवीर सेना बनाई। भूमिहार समाज में आज भी इस बात की टीस है कि लालू राज में भूमिहारों को मारा मरवाया गया।

ऐसे में जाहिर है भूमिहार के लिए विकल्प नीतीश ही थे। और नीतीश इसलिए कि वह बीजेपी के साथ थे। लालू राज और मंडल राजनीति के बाद सवर्णों का झुकाव स्पष्ट रूप से बीजेपी की तरफ है, जिसका फ़ायदा नीतीश कुमार को मिला।

बेशक नीतीश कुमार ने काम करते वक्त पूरे प्रदेश पर ध्यान दिया और हिन्दू मुस्लिम एकता के साथ साथ जातीय संघर्ष ना हों इस बात का भी कुशलता पूर्वक ख्याल रखा, लेकिन वह शुरू से ये मानकर चल रहे थे, वह काम करेंगे और काम के आधार पर जातीय राजनीति की कमजोरी को ढँक देंगे।

इसी आधार उन्होंने 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी से पंगा लिया और राजद और कांगेस के सहयोग से भले अपनी अल्पमत सरकार को बचाए रखा, लेकिन चुनाव में किसी के साथ गठबंधन करने के बजाय अकेले चुनाव मैदान में उतरना मुनासिब समझा और बिहार की जनता से काम के बदले मजूरी के तौर पर वोट मांगे।

लेकिन चुनाव परिणाम बेहद निराशाजनक आये। नीतीश कुमार की पार्टी को सिर्फ दो सीटें मिली। नालन्दा जीतने के लिए भी उन्हें नाको चने चबाने पड़े। उन्हें उम्मीद थी, महादलित, ओबीसी और मुस्लिम वोट देंगे, लेकिन वैसा कुछ नहीं हुआ।

ना मुसलमानों ने उनपर भरोसा किया ना दलितों ने और ना ही ओबीसी ने। इसलिए अगली विधानसभा में राजद और कांग्रेस से गठबंधन किया और फिर भारी बहुमत आया। हर जगह जीत रहे मोदी-शाह को नीतीश से पटकनी खानी पड़ी।

लेकिन बीजेपी के साथ उनका रिश्ता जितना सहज और अनुकूल था, वैसा रिश्ता लालू कुनबे से नहीं हो पाया। इसलिए वापस उन्हें बीजेपी के साथ आना पड़ा। बीजेपी के लिए भी बिना नीतीश बिहार जीतना आसान नहीं था, इसलिए बिना शर्त नीतीश के साथ गठबंधन किया और लोकसभा चुनाव में पांच जीती हुई सीटों की बलि देकर भी बीजेपी ने नीतीश के साथ समझौता किया।

और परिणाम पिछली बार से भी बेहतर आये। पिछली बार 34 सीटें बीजेपी गठबंधन के पास थीं, इस बार 39 सीटें एन डी ए के पाले में आई। बीजेपी की नज़र में नीतीश कुमार की महत्ता इस नजरिये से भी समझिये कि नीतीश कुमार ने कुशवाहा और मांझी को गठबंधन से बाहर करवा दिया क्योंकि दोनों नीतीश कुमार के बाग़ी हैं।

अब सवाल उठता है जब बीजेपी नीतीश कुमार को इतना महत्वपूर्ण मानती है, फिर नीतीश कुमार की पार्टी को मोदी मंत्रिपरिषद में नीतीश कुमार के इच्छानुसार दो सीट क्यों नहीं मिली ?

जो लोग समझ रहे हैं कि बीजेपी नातीश कुमार को उनकी औकात दिखा रही है, उनकी समझ निश्चित रूप से बचकानी है। ऐसा होता तो नीतीश कुमार मोदी और मंत्रिपरिषद के शपथ ग्रहण समारोह में भी नहीं जाते। कुछ लोग कह रहे हैं कि अगर नहीं जाते तो बिहार में बीजेपी नीतीश का साथ छोड़ देती। तो ऐसे में क्या बीजेपी को नुकसान नहीं होता ?

मौजूदा समय में बीजेपी-जदयू के बीच गठबंधन मजबूरी है। और ये बात दोनों समझते हैं। इसलिए ये भविष्यवाणी कि नीतीश कुमार फिर पलटी मारेंगे ये कहना तात्कालिक हालात में सही नहीं है।

मंत्रिपरिषद में शामिल होने से मना करने के पीछे नीतीश कुमार की कुछ और परेशानी है। और वो परेशानी हैं नीतीश कुमार के सबसे निकटस्थ आर सी पी सिंह। जो कभी आईएएस हुआ करते थे, फिर नीतीश कुमार के पीए बने और फिर राज्यसभा सदस्य।

आर सी पी सिंह नीतीश कुमार के गृह जिला नालन्दा के रहने वाले हैं और उनकी ही जात के हैं। लगातार साथ रहने की वजह से श्री सिंह की राजनीतिक महत्वाकांक्षा जाग गयी है और उन्हें लगने लगा कि नंबर दो वही हैं, इसलिए नीतीश कुमार के बाद अगर किसी को पद और महत्त्व मिलना है तो वो वही हैं।

यही कारण रहा कि पहले ललन सिंह से उनका टकराव हुआ और उसके बाद प्रशांत किशोर से। नीतीश कुमार के करीबी और विश्वस्त होने की वजह से उन्हें दोनों पर जीत तो मिली, लेकिन जब दिल्ली में इस बार मंत्री बनने की बारी आई तो श्री सिंह नीतीश कुमार को इग्नोर कर सीधा पीएमओ के संपर्क में पहुँच गए, सूत्र बताते हैं कि नीतीश कुमार को ये बात बुरी लगी और अब आर सी पी सिंह सीधे नीतीश कुमार से टकरा गए हैं।

नीतीश श्री सिंह को किसी भी पल पार्टी से बेदखल कर सकते हैं, लेकिन फिलहाल नालंदा में श्री सिंह नीतीश कुमार का खेल बिगाड़ सकते हैं। खुद जीत तो नहीं सकते, लेकिन नीतीश कुमार के डमी उम्मीदवार को हराने की कूबत रखते हैं।

दूसरी बात है नीतीश कुमार चुनातियों से न तो घबराते हैं और ना ही सीधा एक्शन लेते हैं। वो राजनीति के माहिर खिलाड़ी हैं। ये जो अभी अभी बिहार में मंत्रिपरिषद का विस्तार हुआ है, उसका कनेक्शन बीजेपी से नहीं अपने ही आस्तीन में छुपे लोगों से है।

याद रहे नीतीश कुमार अपने आस्तीन में सांप पालना पसंद नहीं करते, इसीलिये कभी किसी कुर्मी नेता को उभरने नहीं दिया और जिसने भी उनको आँख दिखाने की सोची उसे गर्त में दबा कर दम लिया। कुशवाहा, मांझी और लालू उदाहरण हैं।

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