» तीन तलाक को राष्ट्रपति की मंजूरी, 19 सितंबर से लागू, यह बना कानून!   » तीन तलाक कानून पर कुमार विश्वास का बड़ा रोचक ट्विट….   » मुंशी प्रेमचंद: हिंदी साहित्य के युग प्रवर्तक   » बिहार के विश्व प्रसिद्ध व्यवसायी सम्प्रदा सिंह का निधन   » पत्नी की कंप्लेन पर सस्पेंड से बौखलाया था हत्यारा पुलिस इंस्पेक्टर   » कर्नाटक में सरकार गिरना लोकतंत्र के इतिहास में काला अध्याय : मायावती   » समस्तीपुर से लोजपा सांसद रामचंद्र पासवान का निधन   » दिल्ली की 15 साल तक चहेती सीएम रही शीला दीक्षित का निधन   » अपनी दादी इंदिरा गांधी के रास्ते पर चल पड़ी प्रियंका?   » हाई कोर्ट ने खुद पर लगाया एक लाख का जुर्माना!  

एक ऐतिहासिक फैसलाः जिसने तैयार की ‘आपातकाल’ की पृष्ठभूमि

Share Button

INR. 44 साल पहले 12जून, 1975 इलाहाबाद हाईकोर्ट का वह फैसला जिसने सबसे ताकतवर महिला प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी की राजनीति अध्याय को ही नहीं पलटा बल्कि  देश की राजनीति की दिशा ही  बदल दी थी। इस फैसले ने श्रीमती गांधी को अंदर तक हिलाकर रख दिया।

इलाहाबाद हाईकोर्ट का वो फैसला देश में आपातकाल की पृष्ठभूमि तैयार कर दी थी। संभवतः यही वह फैसला रहा,जिसने आजादी के तीस साल बाद देश में पहली गैर कांग्रेस सरकार के गठन का रास्ता भी  तैयार हुआ।

12 जून, 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट में अन्य दिनों की तुलना में ज्यादा गहमागहमी थी। जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा की अदालत में सोश्लिस्ट नेता राज नारायण  की पीएम इंदिरा गाँधी को चुनौती देने वाली याचिका पर फैसला सुनाया जाना था। उस फैसले को लेकर स्वयं इंदिरा गाँधी कोर्ट में मौजूद थी।

जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ने फैसला सुनाते हुए इंदिरा गाँधी को चुनावी गड़बड़ी का दोषी मानते हुए उन्हें छह वर्ष तक किसी भी संवैधानिक पद के लिए अयोग्य घोषित कर दिया।

श्री सिन्हा ने अपने फैसले में कहा कि” प्रतिवादी संख्या 1 (इंदिरा गांधी) कानून के सेक्टर 123 (7)के तहत भ्रष्ट आचरण की दोषी हैं । इस आधार पर उन्हें इस आदेश की तिथि से छह सालों के लिए किसी भी संवैधानिक पद के लिए अयोग्य घोषित किया जाता है।”

इस आदेश को सुनते ही कोर्ट रूम में सन्नाटा पसर गया। श्रीमती गांधी  सन्न रह गई। जैसे लगा उनके पैरों तले से जमीन घिसक गई हो।

इंदिरा गाँधी ने 1971 में रायबरेली से शानदार जीत दर्ज की थी। उन्होंने सोश्लिस्ट राज नारायण को हराया था। बाद में राज नारायण ने जनप्रतिनिधित्व कानून के उल्लंघन और चुनावी गड़बड़ियों का आरोप लगाते हुए उनकी जीत को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

राजनारायण की याचिका दो आधारों पर स्वीकार की गई थी। पहला यह कि प्रधानमंत्री सचिवालय के ओएसडी राजकुमार कपूर का इस्तेमाल श्रीमती गांधी ने चुनाव एजेंट के तौर पर किया था।

कोर्ट ने माना कि राजकुमार कपूर ने 7 जनवरी 1971 से ही चुनाव प्रचार शुरू कर दिया था। लेकिन अपना इस्तीफा उन्होंने एक सप्ताह बाद दिया। इसके बाद भी वे सचिवालय में बने रहे। साथ ही कोर्ट ने माना कि उन्होंने अपनी रैलियों के पंडाल आदि बनाने में यूपी के अधिकारियों की मदद ली थी।

कहा जाता है कि जस्टिस सिन्हा ने श्रीमती गांधी को अपील के लिए 15 दिन का समय दिया था। लेकिन शायद उन्हें भी इस ऐतिहासिक फैसले की कल्पना नहीं की होंगी। इसलिए उन्होंने अपील के लिए कोई वकील तक नहीं किया। एक स्थानीय वकील वीएन खेर ने खुद ही अपनी तरफ से सुप्रीम कोर्ट में अपील की अर्जी दाखिल की।

सुप्रीम कोर्ट में छूट्टी होने के कारण यह मामला अवकाशकालीन न्यायाधीश जस्टिस कृष्णा अय्यर के पास पहुँचा।

24जून, 1975 को उन्होंने अपने फैसले में श्रीमती गांधी को आंशिक राहत देते हुए प्रधानमंत्री पद पर बने रहने की अनुमति तो दे दी,लेकिन संसद की कार्यवाही में हिस्सा लेने के अधिकार से वंचित कर दिया।

शायद श्रीमती गांधी को यह फैसला नागवार लगा और उन्होंने एक ऐसा फैसला ले लिया जिसकी कल्पना शायद एक लोकतांत्रिक देश की जनता ने भी नहीं की होंगी।

फैसले के उसी रात उन्होंने देश में इमरजेंसी लागू कर दी। जिसके परिणामस्वरूप देश के तमाम विपक्षी दलों के नेताओं को गिरफ्तार करने एवं उन्हें नजर बंद कर दिया जाने लगा।

इमरजेंसी के दौरान ही 7 नवंबर 1975 को सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया

कहा तो यह भी जाता है कि श्रीमती गांधी ने हाईकोर्ट के फैसले के तुरंत बाद इस्तीफा देने का मन बना ली थी। उन्होंने तय भी कर लिया था कि किसे अगला प्रधानमंत्री बनाया जाएँ।

लेकिन उनके पुत्र संजय गांधी और तबके पश्चिम बंगाल के सीएम सिद्धार्थ  शंकर रे उन्हें ऐसा करने से मना कर दिया था।

देश ने 44 साल पहले आपातकाल का दंश ही नहीं झेला। देश की जनता ने साबित भी किया कि इस देश का आम आदमी सिर्फ़ दो वक्त की रोटी कमाने के लिए ही नहीं है। अपने मूल अधिकारों को जानता भी है,समझता भी है। अधिकारों से वंचित होने पर विद्रोह भी करता है।

हुआ भी यही 21 महीने तक आपातकाल का दंश झेलने के बाद जब 1977 में आम चुनाव हुए तो इसी देश की जनता ने आपातकाल के खिलाफ श्रीमती इंदिरा गाँधी की चूलें हिला कर रख दी। इस देश की जनता ने अपनी वोट की ताकत से उन काले दिनों पर अपना जनमत के महत्व को स्पष्ट कर दिया।

आपातकाल के 44 साल बाद नहीं भूले जाने वाले वो कड़वे अनुभव को याद कर निरंतर लोकतंत्र के खतरे में डालने वाले तथ्यों पर व्यापक विचार विमर्श करते रहना चाहिए।

शायद यही लोकतंत्र की खूबसूरती होगी।

Share Button

Related News:

शादी के बहाने बार-बार यूं बिकती हैं लड़कियां और नेता 'ट्रैफिकिंग' को 'ट्रैफिक' समझते
फालुन गोंग का चीन में हो रहा यूं अमानवीय दमन
'72 हजार' पर भारी पड़ा ‘चौकीदार’
मातम पोसी हेतु नालंदा के महमदपुर पहुंचे मांझी, दिया न्याय का आश्वासन
नालंदा के एसपी के इस आदेश की हर तरफ-हर कोई उड़ा रहा है सरेआम धज्जियां
कांग्रेस ने फोड़ा 'ऑडियो बम', पर्रिकर के बेडरूम में हैं राफेल की फाइलें
अब राजनीति में कूदेगें सिंघम का 'देवकांत सिकरे'!
टीम चयन से नाराज गावस्कर को आई धोनी की याद
बज गई आयोग की डुगडुगी, जानिए 7 चरणों में कहां, कब और कैसे होगा चुनाव
जुड़वा 2 का ट्रेलर जारी, राजा व प्रेम के किरदार में वरुण धवन
गुजरात दंगों में नरेंद्र मोदी पर उंगली उठाने वाले चर्चित पूर्व IPS को उम्रकैद
नीतिश के खिलाफ कांग्रेस के आक्रामक स्टार प्रचारक होगें तेजस्वी
पटना साहिब सीट नहीं छोड़ेंगे ‘बिहारी बाबू’, पार्टी के नाम पर कहा ‘खामोश’
 ‘ओछी टिप्पणियां’ कर रहे हैं केन्द्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटलीः यशवंत सिन्हा
दलित की खातिर सीएम की कुर्सी छोड़ने को तैयार हैं सिद्धारमैया
रेलवे सफर में ये आपके हैं अधिकार
अब परचून की दुकानों में शराब बेचेगी भाजपा सरकार
नालंदा जिप अध्यक्षा के मनरेगा योजना के निरीक्षण के दौरान मुखिया सब लगे गिड़गिड़ाने, पूर्व विधायक लगे...
अपनी दादी इंदिरा गांधी के रास्ते पर चल पड़ी प्रियंका?
जाति-धर्म के नाम पर नहीं, सामाजिक और शैक्षणिक आधार पर हो आरक्षणः उपेन्द्र कुशवाहा
कंगाली से ऐसे करोड़पति बना रेप के आरोपी रसुखदार फलाहारी बाबा
राम भरोसे चल रहा है झारखंड का बदहाल रिनपास
गोरखपुर BRD मेडिकल कॉलेज में ऑक्सीजन सप्लाई ठप होने से 30 बच्चों की मौत
झूठे साबित हो चुके हैं एग्जिट पोल के नतीजे

You May Also Like

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Loading...
loading...
» मुंशी प्रेमचंद: हिंदी साहित्य के युग प्रवर्तक   » पुण्यतिथिः जब 1977 में येदुरप्पा संग चंडी पहुंचे थे जगजीवन बाबू   » कैदी तबरेज तो ठीक, लेकिन वहीं हुए पुलिस संहार को लेकर कहां है ओवैसी, आयोग, संसद और सरकार?   » डॉक्टरी भी चढ़ गयी ग्लोबलाइजेशन की भेंट !   » विकास नहीं, मानसिक और आर्थिक गुलामी का दौर है ये !   » एक ऐतिहासिक फैसलाः जिसने तैयार की ‘आपातकाल’ की पृष्ठभूमि   » एक सटीक विश्लेषणः नीतीश कुमार का अगला दांव क्या है ?   » ट्रोल्स 2 TMC MP बोलीं- अपराधियों के सफेद कुर्तों के दाग देखो !   » जब गुलजार ने नालंदा की ‘सांसद सुंदरी’ तारकेश्वरी पर बनाई फिल्म ‘आंधी’   » आभावों के बीच राष्ट्रीय खेल में यूं परचम लहरा रही एक सुदूर गांव की बेटियां  
error: Content is protected ! india news reporter