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एक ऐतिहासिक फैसलाः जिसने तैयार की ‘आपातकाल’ की पृष्ठभूमि

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INR. 44 साल पहले 12जून, 1975 इलाहाबाद हाईकोर्ट का वह फैसला जिसने सबसे ताकतवर महिला प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी की राजनीति अध्याय को ही नहीं पलटा बल्कि  देश की राजनीति की दिशा ही  बदल दी थी। इस फैसले ने श्रीमती गांधी को अंदर तक हिलाकर रख दिया।

इलाहाबाद हाईकोर्ट का वो फैसला देश में आपातकाल की पृष्ठभूमि तैयार कर दी थी। संभवतः यही वह फैसला रहा,जिसने आजादी के तीस साल बाद देश में पहली गैर कांग्रेस सरकार के गठन का रास्ता भी  तैयार हुआ।

12 जून, 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट में अन्य दिनों की तुलना में ज्यादा गहमागहमी थी। जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा की अदालत में सोश्लिस्ट नेता राज नारायण  की पीएम इंदिरा गाँधी को चुनौती देने वाली याचिका पर फैसला सुनाया जाना था। उस फैसले को लेकर स्वयं इंदिरा गाँधी कोर्ट में मौजूद थी।

जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ने फैसला सुनाते हुए इंदिरा गाँधी को चुनावी गड़बड़ी का दोषी मानते हुए उन्हें छह वर्ष तक किसी भी संवैधानिक पद के लिए अयोग्य घोषित कर दिया।

श्री सिन्हा ने अपने फैसले में कहा कि” प्रतिवादी संख्या 1 (इंदिरा गांधी) कानून के सेक्टर 123 (7)के तहत भ्रष्ट आचरण की दोषी हैं । इस आधार पर उन्हें इस आदेश की तिथि से छह सालों के लिए किसी भी संवैधानिक पद के लिए अयोग्य घोषित किया जाता है।”

इस आदेश को सुनते ही कोर्ट रूम में सन्नाटा पसर गया। श्रीमती गांधी  सन्न रह गई। जैसे लगा उनके पैरों तले से जमीन घिसक गई हो।

इंदिरा गाँधी ने 1971 में रायबरेली से शानदार जीत दर्ज की थी। उन्होंने सोश्लिस्ट राज नारायण को हराया था। बाद में राज नारायण ने जनप्रतिनिधित्व कानून के उल्लंघन और चुनावी गड़बड़ियों का आरोप लगाते हुए उनकी जीत को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

राजनारायण की याचिका दो आधारों पर स्वीकार की गई थी। पहला यह कि प्रधानमंत्री सचिवालय के ओएसडी राजकुमार कपूर का इस्तेमाल श्रीमती गांधी ने चुनाव एजेंट के तौर पर किया था।

कोर्ट ने माना कि राजकुमार कपूर ने 7 जनवरी 1971 से ही चुनाव प्रचार शुरू कर दिया था। लेकिन अपना इस्तीफा उन्होंने एक सप्ताह बाद दिया। इसके बाद भी वे सचिवालय में बने रहे। साथ ही कोर्ट ने माना कि उन्होंने अपनी रैलियों के पंडाल आदि बनाने में यूपी के अधिकारियों की मदद ली थी।

कहा जाता है कि जस्टिस सिन्हा ने श्रीमती गांधी को अपील के लिए 15 दिन का समय दिया था। लेकिन शायद उन्हें भी इस ऐतिहासिक फैसले की कल्पना नहीं की होंगी। इसलिए उन्होंने अपील के लिए कोई वकील तक नहीं किया। एक स्थानीय वकील वीएन खेर ने खुद ही अपनी तरफ से सुप्रीम कोर्ट में अपील की अर्जी दाखिल की।

सुप्रीम कोर्ट में छूट्टी होने के कारण यह मामला अवकाशकालीन न्यायाधीश जस्टिस कृष्णा अय्यर के पास पहुँचा।

24जून, 1975 को उन्होंने अपने फैसले में श्रीमती गांधी को आंशिक राहत देते हुए प्रधानमंत्री पद पर बने रहने की अनुमति तो दे दी,लेकिन संसद की कार्यवाही में हिस्सा लेने के अधिकार से वंचित कर दिया।

शायद श्रीमती गांधी को यह फैसला नागवार लगा और उन्होंने एक ऐसा फैसला ले लिया जिसकी कल्पना शायद एक लोकतांत्रिक देश की जनता ने भी नहीं की होंगी।

फैसले के उसी रात उन्होंने देश में इमरजेंसी लागू कर दी। जिसके परिणामस्वरूप देश के तमाम विपक्षी दलों के नेताओं को गिरफ्तार करने एवं उन्हें नजर बंद कर दिया जाने लगा।

इमरजेंसी के दौरान ही 7 नवंबर 1975 को सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया

कहा तो यह भी जाता है कि श्रीमती गांधी ने हाईकोर्ट के फैसले के तुरंत बाद इस्तीफा देने का मन बना ली थी। उन्होंने तय भी कर लिया था कि किसे अगला प्रधानमंत्री बनाया जाएँ।

लेकिन उनके पुत्र संजय गांधी और तबके पश्चिम बंगाल के सीएम सिद्धार्थ  शंकर रे उन्हें ऐसा करने से मना कर दिया था।

देश ने 44 साल पहले आपातकाल का दंश ही नहीं झेला। देश की जनता ने साबित भी किया कि इस देश का आम आदमी सिर्फ़ दो वक्त की रोटी कमाने के लिए ही नहीं है। अपने मूल अधिकारों को जानता भी है,समझता भी है। अधिकारों से वंचित होने पर विद्रोह भी करता है।

हुआ भी यही 21 महीने तक आपातकाल का दंश झेलने के बाद जब 1977 में आम चुनाव हुए तो इसी देश की जनता ने आपातकाल के खिलाफ श्रीमती इंदिरा गाँधी की चूलें हिला कर रख दी। इस देश की जनता ने अपनी वोट की ताकत से उन काले दिनों पर अपना जनमत के महत्व को स्पष्ट कर दिया।

आपातकाल के 44 साल बाद नहीं भूले जाने वाले वो कड़वे अनुभव को याद कर निरंतर लोकतंत्र के खतरे में डालने वाले तथ्यों पर व्यापक विचार विमर्श करते रहना चाहिए।

शायद यही लोकतंत्र की खूबसूरती होगी।

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