अर्थ व्यवस्था पर जयंत के हाथों यशवंत की घेराबंदी में फंस गई मोदी सरकार

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 अर्थ व्यवस्था पर भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा की घेरेबंदी पहले उनके ही मंत्री बेटे जयंत  के हाथ से तुड़वाने की कोशिश की। लेकिन अब हालात ऐसे हैं कि एक छेद बंद करने से पहले दूसरी सुराख सामने आ जाती है। आरएसएस से जुड़े भारतीय मजदूर संघ ने भी आर्थिक मामलों पर सरकार की नीतियों और सलाहकारों को घेरा है।

भारतीय मजदूर संघ ने ये भी कहा है कि सरकार के पास सही फीडबैक नहीं पहुंच रहा है। इधर यशवंत सिन्हा ने भी साफ कर दिया है कि वो जयंत सिन्हा के जवाब से संतुष्ट नहीं हैं।

एक इंटरव्यू में यशवंत सिन्हा ने यहां तक कह दिया कि अगर जयंत इतने ही काबिल थे तो सरकार ने उन्हें वित्त मंत्रालय से क्यों हटाया?  यशवंत सिन्हा ने साफ किया है कि उन्हें रिश्ते की पेंच में फंसाकर चुप कराने की चाल कामयाब नहीं होगी।

मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों पर लेखों के जरिए पिता पुत्र की दिलचस्प जंग है। यशवंत सिन्हा का लेख कहता है कि वित्त मंत्री फेल और अर्थ व्यवस्था चौपट है तो

जयंत कहते हैं कि सीमित तथ्यों के आधार पर विश्लेषण सही नहीं है और लंबे समय में रोटी, कपड़ा, मकान, रोजगार सब मिलेगा।

यशवंत कहते है कि एनपीए की समस्या से निपटने में नाकाम हुई तो जयंत दिवालिया कानून को एनपीए का इलाज बताते हैं।

यशवंत सिन्हा के मुताबिक नोटबंदी और जीएसटी बर्बादी देने वाले दो बड़े झटके थे तो जयंत नोटबंदी, जीएसटी और डिजिटाइजेशन को गेम चेंजर बता रहे हैं।

यशवंत सिन्हा को लगता है कि वित्त मंत्री सबको गरीबी दिखाना चाहते हैं तो जयंत सिन्हा ऑटो रिक्शा से सस्ती विमान सेवा देने का दावा कर रहे हैं।

साफ है कि जयंत सिन्हा ने अपने लेख में राजनीतिक बातों से दूरी बनाते हुए यशवंत सिन्हा को जवाब देने की कोशिश की है।

जयंत ने यशवंत सिन्हा के लेख में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की टेक्नीकल वजह से मंदी वाली टिप्पणी, वित्त मंत्री की नाकामी और पार्टी के भीतर खामोशी की चर्चा पर कुछ नहीं कहा है।

शायद यही वजह है कि यशवंत सिन्हा नहीं मानते कि जयंत के लेख से उन्हें जवाब मिल गया। वो साफ करते हैं जयंत सिन्हा को आगे कर अगर सरकार सोचती है कि वो पिता-पुत्र की सियासत में उलझकर पीछे हट जाएंगे तो ऐसा नहीं है।

यशवंत सिन्हा के बाद संघ परिवार की अहम इकाई भारतीय मजदूर संघ ने भी कहा है कि सही फीडबैक की कमी, गलत सलाहकारों और गलत दिशा वाले रिफॉर्म के चलते प्रधानमंत्री मोदी के इरादे और मेहनत का फल नहीं मिल पा रहा है।

भाजपा नेता सुब्रमणियन स्वामी कहते हैं कि प्रधानमंत्री को अपने परिवार के लोगों की बात सुननी होगी, लेकिन उनकी नहीं जो अपना मतलब साधना चाहते हैं।  

साफ है कि भाजपा और संघ परिवार के अर्थ व्यवस्था का हालत पर आवाज उठाने वालों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। तो क्या सरकार अब ये मानेगी कि उससे गलतियां हुई हैं और उसे सुधारा जाएगा?

लेकिन उससे पहले ये सवाल है कि क्या जयंत सिन्हा को आगे कर सरकार यशवंत सिन्हा को खामोश करवाना चाहती है?  पिता-पुत्र की सियासत को अगर किनारे रखकर भी सोचें तो सवाल उठता है कि अर्थ व्यवस्था पर में यशवंत सिन्हा की राय ज्यादा सही हैं या जयतं सिन्हा की?

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