अयोध्या जन्मभूमि विवादः कानून की निगाह में रामलला हैं नाबालिग

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राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक रूप से संवेदनशील इस मुकदमे में दोनों ओर से किये जा रहे प्रतिस्पर्धी दावे को देखते हुए देवता के बारे में कानूनी स्थिति पर विचार करना अहम हो जाता है……………..”

इंडिया न्यूज रिपोर्टर डेस्क। अयोध्या राम जन्मभूमि पर मालिकाना हक के मुकदमे की सुनवाई अंतिम दौर में है। इस मुकदमे में अन्य पक्षों के अलावा रामलला विराजमान और जन्मस्थान की ओर से अलग से मुकदमा दाखिल कर जन्मभूमि पर मालिकाना हक का दावा किया गया है।

इस मामले में दोनों को अलग-अलग देवता और न्यायिक व्यक्ति बताते हुए निकट मित्र की ओर से मुकदमा किया गया। 1989 में निकट मित्र के तौर पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश देवकीनंदन अग्रवाल ने यह केस दर्ज किया था।

इस मुकदमे में हिंदू पक्ष का पूरा जोर रामलला विराजमान और जन्मस्थान को देवता और न्यायिक व्यक्ति साबित करने पर है। जबकि मुस्लिम पक्ष जन्मभूमि को देवता और अलग से न्यायिक व्यक्ति मानने का विरोध कर रहा है।

कानून की निगाह में मूर्ति यानी हिंदू देवता न्यायिक व्यक्ति माना जाता है और उसे वही सारे अधिकार प्राप्त होते हैं, जो किसी जीवित व्यक्ति के होते हैं।

लेकिन कानून की निगाह में देवता हमेशा नाबालिग होते हैं। इसीलिए उनकी संपत्ति को लेकर सामान्य बालिग व्यक्ति की संपत्ति पर लागू नियम से भिन्न नियम लागू होते हैं।

सुप्रीम कोर्ट के बहुत से फैसलों के बाद कानून का यह तय सिद्धांत है कि देवता नाबालिग ही माने जाते हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि जिस तरह बच्चा अपने बारे में स्वयं निर्णय नहीं कर सकता, उसी तरह देवता भी स्वयं अपने हित नहीं देख सकते।

उनकी जगह कोई और उनके हित देखता है, जैसे- निकट मित्र। कानून कहता है कि किसी भी समझौते के तहत नाबालिग को संपत्ति से बेदखल नहीं किया जा सकता।

इस मुकदमे में हिंदू पक्ष की ओर से यही दलील दी गई है कि देवता पर समय सीमा का सिद्धांत लागू नहीं होगा और न ही देवता के खिलाफ प्रतिकूल कब्जे का दावा किया जा सकता है।

उनका कहना है कि जब देवता को हटाया नहीं जा सकता तो फिर प्रतिकूल कब्जे का दावा कैसे हो सकता है। हालांकि मुस्लिम पक्ष की दलील है कि देवता की संपत्ति पर भी समय सीमा और प्रतिकूल कब्जे का सिद्धांत लागू होगा। लेकिन पेच हिंदू पक्ष की ओर से जन्मस्थान को ही देवता और न्यायिक व्यक्ति बताए जाने को लेकर है।

इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के तीन में से दो न्यायाधीशों ने माना है कि जन्मस्थान देवता और न्यायिक व्यक्ति है। देवता की मूर्ति यानी रामलला को नाबालिग और न्यायिक व्यक्ति तीनों न्यायाधीशों ने माना है, क्योंकि इस बारे में कानून तय है।

अब सुप्रीम कोर्ट को तय करना है कि वह जन्म स्थान को अलग से न्यायिक व्यक्ति और देवता मानता है या नहीं।

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