…अब मैं ‘उल्लू’ बनना चाहता हूँ

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हे माँ! अब मैं उल्लू बनना चाहता हूँ। मैंने निश्चय किया है कि मैं अब अपने सभी वसूलों, सिद्धान्तों की तिलांजलि दे दूँगा। अपनी शरण में ले लो। मेरा उद्द्धार कर दो। अब तक मैं तेरी प्रतिद्वन्दी का सुपुत्र कहलाने में अपने जीवन का काफी समय व्यर्थ में गंवा चुका हूँ। जी हाँ हे माँ! अकल आई भले ही देर से। कहते हैं देर आयद, दुरूस्त आयद। माँ यदि तुम मुझे अपने वाहन का दर्जा दे दोगी तो मैं उसे निष्ठापूर्वक ईमानदारी से निभाऊँगा……….

आज तुम्हारी याद आ रही है। इसके पीछे अनेकानेक कारण हैं। मैं चन्द चुनिन्दा वजहें ही बताऊँगा। हे माँ! हमारे बाबा (ग्राण्ड पा) कहा करते थे- ‘‘लक्ष्मी तोहिंमा सर्वगुण, तोहिं बिनु मनुष पतंग, तोहिं देखि गिरिवर नवै, नारि पसारत अंग……..।’’ बाबा जी को परलोकगामी हुए आधी सदी से अधिक हो गया। मौजूदा समय में जब मेरी हालत पतंग जैसी हो गई तब उनकी कही गई यह बात मुझे याद आ रही है।

माँ! तुम जगत-जननी हो। सर्वज्ञ हो। मेरी पीड़ा बेहतर समझ सकती हो। दुर्दशाग्रस्त मेरी हालत तुमसे छुपी नहीं है। मृत्यु लोक में 21वीं सदी चल रही है। लोग बाग सुख-सुविधा सम्पन्न जीवन जी रहे हैं। हमारे भारत जो इण्डिया है में कथित लोकतंत्र चल रहा है। यत्र-तत्र-सर्वत्र नेताओं की जयकार हो रही है। उनके पीछे भीड़ है, मीडिया है और मनी की तो कोई गिनती ही नहीं। मैं सिद्धान्तवादी बना हुआ नेताओं की भीड़ का अंग नहीं बन पाया, परिणाम यह रहा कि भौतिक शरीर को जिन्दा रखने के लिए दो जून की रोटी भी मयस्सर होना दिक्कत तलब हो गया।

डॉ. भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी , वरिष्ठ नागरिक/स्तम्भकार अकबरपुर, अम्बेडकरनगर (उ.प्र.)।

भारत जो इण्डिया है, उसकी डेमोक्रेसी में जातिवाद एक वटवृक्ष की तरह पुष्पित, पल्लवित हो रहा है। साथ ही धनबल, बाहुबल और सत्ता की शक्ति जैसे अस्त्र-शस्त्र का प्रयोग नित्-नित् किया जा रहा है। सफेदपोश माननीयों के पीछे चलने वाली भीड़ को देखकर मुझे याद आता है कि ‘डेमोक्रेसी इज गवर्नमेन्ट ऑफ द फूल्स, फार द फूल्स एण्ड बाइ द फूल्स……।’ इसी लिए मैं भी एक एजुकेटेड फूल बनना चाहता हूँ।

कहते हैं कि माँ तेरा वाहन फिरंगी भाषा में फूल कहा जाता है। आम बोलचाल की भाषा में उसे उल्लू कहते हैं। बना ले, बना ले मुझे अपना वाहन। मैं उल्लू बनना चाहता हूँ। ऐसा बनकर मैं तेरी कृपा का पात्र बन जाऊँगा तब मेरे पास भौतिक सुख-सुविधा, साधनों की कमी नही रहेगी। मैं अभावग्रस्त जीवन नहीं जीऊँगा।

माँ! मुझ वर दे। मैं उल्लू बनकर धनवान होना चाहता हूँ। दो पहिया, चार पहिया लग्जरी मोटर वाहनों का स्वामी बनने के साथ-साथ भव्य आलीशान भवनों में रहना चाहता हूँ। हे माँ मैं जब उन्हें देखता हूँ जो सरस्वती शून्य हैं और तेरी कृपा के पात्र हैं तो मुझे अपने आप से कोफ्त होने लगती है। अभी गत दिवस मैंने एक ऐसे नौजवान को देखा जो एक माननीय का पिछलग्गू है।

वह एक मैय्यत में अपने चार पहिया लग्ज़री वाहन से दोस्तों के साथ श्मशान घाट तक गया हुआ था। इसके वहाँ पहुँचने से मृत आत्मा कितनी शान्त हुई होगी यह तो नहीं बता सकता परन्तु इस युवा नेता व इसकी टीम की गतिविधि से घाट पर अवश्य ही अशान्ति का माहौल बन गया था। लोगों का ध्यान चिता पर रखे शव को जलाने में कम उसकी तरफ ज्यादा थी।

इसी उम्र के कुछेक युवा समाजसेवी देखने को मिले पता करने पर मालूम हुआ कि वह लोग मांगलिक कार्य में शिरकत करने जा रहे हैं। मांगलिक कार्य प्रयोजन में निमंत्रण हो और भोजन आदि की व्यवस्था तो आज का नौजवान उसे कत्तई मिस नहीं कर सकता। देखा गया है कि सैकड़ो किलोमीटर की दूरी से आया बाराती बड़ी आसानी से मदिरालय ढूंढ लेता है ठीक उसी अन्दाज में लग्ज़री वाहनों पर सवार कथित युवा समाजसेवी वैवाहिक कार्यक्रमों में उपस्थित होने से पूर्व मयखाना जाकर जमकर मदिरापान करते हैं

संकोच करते हुए एक नव धनाढ्य युवा से पूछा था कि भइया यह बताओ कि यह चार पहिया वाहन कितने का लिया और इसका उपयोग व प्रयोग किस लिए करते हो……..? तो उसने कहा कि आज कल जिसके पास यह सब नहीं है उसका जीवन बेकार है।

अब देखिये न यदि मेरे पास यदि बोलेरो न होती तो मैं मंत्री जी के सगे संबन्धी के निधन पर उनके आवास कैसे जा पाता। वाहन होने का यह लाभ तो है कि मैं समाज में एक प्रतिष्ठित व्यक्ति के रूप में अपने को स्थापित कर रहा हूँ।

इसी लिए वाहन का प्रयोग मैय्यत से लेकर शादी-ब्याह जैसे कार्यों में करके आसानी से अपनी उपस्थिति हर जगह दर्ज करवाता हूँ। ससुराल में कुँआरी साली, सरहजें व अन्य ससुरालीजन में रूतबा-रूआब बढ़ जाता है। यदि मैं ऐसे महत्वपूर्ण स्थानों पर बगैर अपने निजी साधन के जाता तो मेरी गणना न के बराबर होती। परन्तु जब मैं अपने वाहन से रूतबे के साथ जाता हूँ तो वहाँ उपस्थित लोगों की निगाहें मेरी ही तरफ ही उठती हैं।

हे माँ! तेरी आराधना तो मेरे अगल-बगल वाले जोर-शोर से करते रहे परन्तु मैं ही अज्ञानी बना इधर से विमुख रहा। माँ मुझे माफ कर दो। मेरे दुःख-दारिद्र का हरण कर लो। मुझे उल्लू बना दो। मैं तेरा वाहन बनकर सब कुछ ठीक उसी तरह करूँगा जैसा कि समय की मांग है। मैं कसम खाता हूँ कि उल्लू बनने के बाद कुछ भी ऐसा-वैसा नहीं करूँगा जिसको लेकर लोग तेरी महिमा पर उँगली उठा सकें।

माँ! अब तक वीणा वादिनी ने मुझे जो वर दिया था उसके परिणाम की वजह से मुझे पारिवारिक तानों-उलाहनों के तहत गोबर कहा जाता है। परन्तु माँ मैंने सोचा है कि जब तेरा आशीर्वाद मुझे प्राप्त होगा तो मैं यह साबित कर दूँगा कि वह गोबर हूँ जो किसी भी मौसम में सर्वथा उपयोगी होता है। (कृपया लोग मुझे बरसात के मौसम का गोबर न समझें।) हे मैय्या दे दे मुझे उल्लू बनने का वरदान, पार हो जाए मेरी भी नैय्या। तू माँ है, दयालु है, मुझ अज्ञानी को कृपालु बनकर अपनी कृपा से उल्लू बना दे।

माँ यदि तू मान गई तो उल्लू बनते ही मैं श्वेत वसनधारी की नकल करते हुए उन्हीं के रंग का परिधान व परफ्यूम प्रयोग करना शुरू करूँगा और लग्ज़री वाहन, मोटर बाइक्स व आलीशान मकान खरीदूँगा। धनबल आ जाने पर बाहुबल बढ़ जाता है। मैं भी धनबली, बाहुबली कहलाऊँगा। लोगों की शवयात्रा में शामिल होऊँगा, दाह-संस्कार स्थल पर जाऊँगा। शुभ एवं मांगलिक मंचों पर फीता काटूँगा।

मृतकों के परिजनों को सान्त्वना दूँगा। इलेक्शन के दौरान प्रत्याशियों के लिए वोट मागूँगा। मुण्डन, खतना, पूजन कार्यक्रमों में शामिल होऊँगा। मीडिया मैनेज करूँगा। सेल्फी लेने वालों की टीम रखूँगा। सोशल मीडिया पर एक्टिव रहने के लिए अपलोडर रखूँगा। 10- 20 फट्ठा व बन्दूकधारी नित्य-नियमित झगड़ालू व विवादित जमीनों पर काबिज हो उसकी प्लाटिंग उपरान्त क्रय-विक्रय करके मुझे मालामाल करते रहेंगे।

माँ! मैं सुबह से लेकर शाम ही नहीं सोते, जागते तेरा ही नाम जपुँगा। यह बात दीगर है कि ऐसे में मैं भूल जाऊँगा कि जो जन्मा है वह मृत्यु को अवश्य ही प्राप्त होगा, उसके द्वारा अर्जित, संचित सब कुछ यहीं रह जाएगा। अकेला आया था अकेला जायेगा। या सिकन्दर खाली हाथ आया था और खाली हाथ चला गया।

हे माँ………… लक्ष्मी माँ! मुझे अपना वाहन यानि उल्लू बनने का सौभाग्य प्रदान कर ताकि मैं भी जीवन का बची खुची अवधि समय के अनुकूल ऐशो-आराम के साथ जी सकूँ। माँ मैं अभावग्रस्त हूँ……….शारीरिक व मानसिक रूप से अस्वस्थ हूँ। मुझे उल्लू बनाकर जल्द ही धनवान बना। मैं अब बेनामी मौत नहीं मरना चाहता।

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