अपनी दादी इंदिरा गांधी के रास्ते पर चल पड़ी प्रियंका?

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“विपक्ष में रहते हुए सरकार के प्रति विरोध जताने तरीकों को लेकर इंदिरा गांधी का चर्चा की जाती है। वे 1977 के अगस्त महीने में बतौर विपक्षी नेता हाथी की पीठ पर आधी रात में बिहार के बेलछी गांव पहुंच गई थीं…..”

एक्सपर्ट मीडिया न्यूज नेटवर्क। कांग्रेस नेत्री  प्रियंका गांधी सोनभद्र जाना चाहती थीं। लेकिन उन्हें रोक लिया गया। सोनभद्र से करीब 25 किलोमीटर पहले नारायण पुलिस चौकी पर उन्हें आगे नहीं जाने दिया गया। इसके बाद प्रियंका सड़क पर बैठ गईं।

उन्होंने विरोध किया। प्रियंका को हिरासत में लिया गया। सोनभद्र मामले पर प्रियंका का रुख क्या इंदिरा गांधी की याद दिलाता है? जनता से सीधे संवाद को लेकर इंदिरा गांधी का अपना तरीका था। उसी तरह का विरोध प्रियंका ने जताने की कोशिश की है।

इस विषय पर आगे चर्चा से पहले सोनभद्र का मामला जान लेना जरूरी है। 17 जुलाई को सोनभद्र जिले के घोरावल के मूर्तियां गांव में बुधवार को जमीनी विवाद में ग्राम प्रधान और ग्रामीणों के बीच हुई हिंसक झड़प में गोली लगने से एक पक्ष के 9 लोगों की मौत हो गई। तीन अन्य गंभीर रूप से घायल हुए।

प्रियंका यहीं जाना चाहती थीं। उन्होंने कहा भी कि वो पीड़ित परिवारों से मिलना चाहती हैं। उन्होंने कहा, ‘मुझे वहां न जाने देने का कोई कानूनी आधार दिखाया जाए।

विपक्ष में रहते हुए सरकार के प्रति विरोध जताने तरीकों को लेकर इंदिरा गांधी का चर्चा की जाती है। वे 1977 के अगस्त महीने में बतौर विपक्षी नेता हाथी की पीठ पर आधी रात में बिहार के बेलछी गांव पहुंच गई थीं।

उनके उस दुस्साहस की बराबरी पक्ष-विपक्ष का कोई भी नेता भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में आज तक नहीं कर पाया। बमुश्किल 500 बेहद गरीब लोगों का बेलछी गांव तब नरसंहार के कारण सुर्खियों में था।

इंदिरा गांधी आपातकाल के बाद 1977 में हुए ऐतिहासिक आम चुनाव में बतौर प्रधानमंत्री अपनी और कांग्रेस की बुरी तरह हुई हार के बाद घर पर बैठी थीं।

प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई की सदारत में जनता पार्टी की सरकार बने बमुश्किल नौ महीने हुए थे। तभी बिहार के नालंदा में दूरदराज गांव बेलछी में दलितों का यह जघन्य कत्लेआम हो गया।

जनता की नब्ज पकड़ने में माहिर इंदिरा गांधी ने मौका ताड़ा और दिल्ली से हवाई जहाज के जरिए सीधे पटना और वहां से कार से बिहार शरीफ पहुंच गईं। तब तक शाम ढल गई और मौसम बेहद खराब था।

नौबत इंदिरा गांधी के वहीं फंस कर रह जाने की आ गई। लेकिन वे रात में ही बेलछी पहुचने की जिद पर डटी रहीं। स्थानीय कांग्रेसियों ने बहुत समझाया कि आगे रास्ता एकदम कच्चा और पानी से लबालब है, लेकिन वे पैदल ही चल पड़ीं।

मजबूरन साथी नेताओं को उन्हें जीप में ले जाना पड़ा मगर जीप कीचड़ में फंस गई। फिर उन्हें ट्रैक्टर में बैठाया गया तो वह भी गारे में फंस गया।

इंदिरा तब भी अपनी धोती थामकर पैदल ही चल दीं तो किसी साथी ने हाथी मंगाकर इंदिरा गांधी और उनकी महिला साथी को हाथी की पीठ पर सवार किया।

बिना हौदे के हाथी की पीठ पर उस उबड़-खाबड़ रास्ते में इंदिरा गांधी ने बियाबान अंधेरी रात में जान हथेली पर लेकर पूरे साढ़े तीन घंटे लंबा सफर किया।

वे जब बेलछी पहुंची तो खौफजदा दलितों को ही दिलासा नहीं हुआ, बल्कि वे पूरी दुनिया में सुर्खियों में छा गईं। हाथी पर सवार उनकी तस्वीर सब तरफ नमूदार हुई। जिससे उनकी हार के सदमे में घर में दुबके कांग्रेस कार्यकर्ता निकलकर सड़क पर आ गए।

इंदिरा के इस दुस्साहस को ढाई साल के भीतर जनता सरकार के पतन और 1980 के मध्यावधि चुनाव में सत्ता में उनकी वापसी का निर्णायक कदम माना जाता है।

प्रियंका गांधी ने परिवहन के लिए प्रतीकात्मक साधन का इस्तेमाल तो नहीं किया। लेकिन गांव वालों के साथ दिखना या पीड़ितों के साथ खड़े दिखने का उनका तरीका वैसा ही है, जैसे इंदिरा गांधी किया करती थीं।

दिलचस्प है कि इस मामले में बाकी विपक्षी पार्टियों यहां तक कि कांग्रेस की तरफ से भी बहुत ज्यादा विरोध देखने में नहीं आया। स्थानीय नेताओं की ओर से उस तरह का विरोध नहीं दिखा, जैसा आमतौर पर विपक्षी पार्टियां करती हैं। इस बीच प्रियंका ने सोनभद्र जाने का फैसला किया।

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