अगर ऐसा है तो आप इन्सान हैं, अन्यथा जानवर..!

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अगर किसी समुदाय के लोग ऐसा मानते हैं, तभी वह धर्म है। अन्यथा सब धर्म और ईश्वर के नाम पर सत्ता जमाने और चलाने वाले जानवर हैं, वह इन्सान तो कतई हो ही नहीं सकता……..”

एक्सपर्ट मीडिया न्यूज डेस्क। भगवान है या नहीं। ये हज़ारों साल बाद भी सवालों के बीच है। आस्था भगवान के अस्तित्व को स्वीकारती है, जबकि तर्क नकार देता है और सवाल खड़े करता है कि भगवान अगर होते और सभी जीव अगर ईश्वर की ही संतान होते, तो कमज़ोरों पर इतना ज़ुल्म क्यों? भगवान के नाम पर मंदिरों, मस्जिदों और गिरिजा घरों तक में लूट और शोषण क्यों? भगवान के नाम पर खून ख़राबा क्यों ?

हिंदी सिने जगत के जाने-माने लेखक धनंजय कुमार के विचार…..

गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है जब जब धर्म की हानि होती है, भगवान अवतार लेते हैं और दुष्टों का संहार करते हैं। मुस्लिम धर्मग्रंथ भी धर्म की रक्षा के लिए जेहाद की बात करता है।

यहाँ तक कि ईसा मसीह और भगवान बुद्ध को मानने वाले भी हिंसा में खूब रत रहते हैं? क्या ईश्वर वाकई किसी को यह अख्तियार देता है कि आप किसी का खून बनाएं?  क्या ये सब भगवान की देख रेख और दिशा निर्देश में होता है?

जब राजाओं का शासन था, तब कहा गया कि राजा भगवान का प्रतिनिधि होता है, इसलिए राजा का फ़रमान ईश्वर का फ़रमान है। लेकिन राजाओं के आपस में ही लड़ने से इतिहास भरा पड़ा है। क्या ईश्वर आपस में ही धर्म की पुनर्स्थापना या धर्म की रक्षा के लिए लड़ा करते थे?

गांधी ने पहली बार दुनिया के सामने ये उदाहरण रखा कि बिना हिंसा के भी न्याय के लिए लड़ा जा सकता है। जबकि वो अनीश्वरवादी नहीं थे। भगवान में उनका भरोसा था और “वैष्णव जन तो तैने कहिये जे पीड़ पराई जाणे रे” उनके जीवन का सूत्र वाक्य था।

तुलसीदास जी ने भी कहा है, परहित सरिस धर्म नहीं भाई। यानी किसी की पीड़ा को समझना ही असली धर्म है। मैंने अनंत किताबें तो नहीं पढी हैं, लेकिन अनंत किताबों का सार पढ़ा है कि जीवन और जीवन की रक्षा सर्वोपरि है। इसलिए आधुनिक दुनिया ने भी जब न्याय के लिए क़ानून की किताब लिखी तो आत्मसुरक्षा में हिंसा को भी न्याय संगत माना।

हालांकि गांधी किसी भी कीमत पर हिंसा के पैरोकार नहीं थे। आत्मसुरक्षा के लिए भी नहीं। यह धर्म की पराकाष्ठा है। मानवीयता की पराकाष्ठा है। वह तो चाहते थे कि दुनिया को सेना के खात्मे पर भी सोचना चाहिए।

शस्त्र और शास्त्र से परे वह व्यक्ति की स्वतन्त्रता में विश्वास करते थे। इसीलिये सुराज और स्वशासन उनका लक्ष्य था। उनके राम तीर धनुष वाले राम नहीं थे। उनके राम मर्यादाओं के पालन करने वाले राम थे।

लेकिन जो राम का मंदिर बनाना चाहते हैं, उनके राम कौन हैं? जो राम के नाम पर किसी निर्दोष की हत्या करने-करवाने से नहीं चूकते हैं उनके राम कौन हैं? धर्म जीव की रक्षा है या धर्म पूजा पद्धतियों के नाम पर एक दूसरे को नीचा दिखाना या मारना है?

धर्म युद्ध ने नाम पर मुस्लिम चरमपंथियों ने जो रक्तपात मचाया हुआ है पूरी दुनिया में वो धर्म नहीं है। धर्म वो भी नहीं है, जो मुसलमान के नाम पर हिन्दुओं या ईसाईयों को विरोध करना सिखाता है।

लेकिन जो लोग धर्म के नाम पर निर्दोषों की हत्या को जायज ठहराते हैं, वो विधर्मी हैं। हिन्दू, मुसलमान, ईसाई या बौद्ध होना धार्मिक होना नहीं है। वो साम्प्रदायिक होना है। वास्तविकता में धार्मिक वही है, जो दूसरों की जान की परवाह पहले करे।

और अगर लगता है कि धर्म की रक्षा के लिए राजा या राजा की सेना द्वारा हिंसा जायज है तो फिर यकीन मानिए भगवान नहीं है। भगवान के नाम पर कोई और सत्ता चला रहा है और लाखों-करोड़ों-अरबों लोगों को बेवकूफ बना रहा है। उससे हक़ और न्याय के लिए लड़ने की शक्ति भी छीनना चाहता है।

परलोक के नाम पर या जन्नत के नाम पर लोगों को यथास्थिति क़ुबूल करने के लिए प्रेरित करना उस सत्ताधीश की बड़ी साजिश है। और इसी साजिश के अलग अलग तरीके हैं, भगवान, भय, आस्था और अन्धविश्वास।(साभारःफेसबुक वाल)

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